मजबूरीयों में बधे
March 27, 2008 by Shubhashish Pandey
अश्क भी अब सहमें से पलकों मे छुपे रहते हैं,
मेरी तरह ये भी तनहाई और घुटन सहते हैं,
डरतें है कि कहीं देख ना ले इन्हे कोई,
निकलना चाहते हैं पर मजबूरीयों में बधे रहते हैं |
…………………………………..Shubhashish(1999)


