अब टुट के गिर गया हू,
तो क्यों नहीं फिर उठा रहा,
गर था ले रहा तु इम्तेहा तो,
अब जीत का एहसास क्यों नहीं दिला रहा,
हम तो हार गये,
और कर रहे हैं इल्तजा,
तो तु मेरे पास फिर,
क्यों नहीं आ रहा,
मेरी सासें हो रही हैं धीरे,
खत्म हो रही है धडकन,
क्यों नहीं तु मेरी,
सदा सुन पा रहा,
हम तो पागल से हो गये हैं,
अपना सब कुछ गवां कर,
अब क्यों नहीं,
तु मुझे अपना रहा |
…………… Shubhashish(2000)




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