मैं जानता नहीं
April 3, 2008 by Shubhashish Pandey
आज फिर क्यों आँख भर आई है मैं जानता नहीं,
आज फिर क्यों उदासी छाई है मैं जानता नहीं,
रोते जाऊं यूहीं बस ये ही दिल कर रहा है,
रोकर भी दिल उतना ही भारी क्यों हैं मैं जानता नहीं|
किस्मत ने अपनों को पराया किया कुछ ऐसे मेरे सामने,
आज इस दुनिया में मेरा अपना कौन है मैं जानता नहीं |
इन अकेली राहों पर बस चले जा रहे हैं,
पर मंजिल कहाँ है इन राहों की मैं जानता नहीं|
इतने ग़मों के बाद तो आदत पड़ जानी थी दर्द सहने की,
पर हर नया जख्म नया दर्द क्यों देता है मैं जानता नहीं|
हर घाव के बाद जिंदगी से बेरुखी और बढ़ जाती है,
पर इतना सह कर भी जिंदा क्यों हूँ मैं जानता नहीं|
यूँ तो कभी तूफानों से डरता नहीं था पहले भी मैं,
पर खुद को इसके हवाले क्यों कर दिया मैं जानता नहीं|
लोगो को रंजो-गम की दावा देता फिरता हूँ तो क्या,
अपने रोग का इलाज खुद मैं जानता नहीं|
दास्तान-ए-गम को जिगर से रुसवा यूँ तो करता नहीं,
पर आज ये क्यों पन्ने पे उतर आई है , मैं जानता नहीं |
…………………………………….. Shubhashish(2004)



लोगो को रंजो-गम की दवा देता फिरता हूँ तो क्या
अपने रोग का इलाज खुद मैं जानता नहीं.
–उम्दा शेर.