जीने के लिये इस दुनिया में कुछ खास नही रह जाता है
सब कुछ होता है फिर भी कुछ पास नही रह जाता है
खुद अपने मे घुट कर जब अरमान युं ही मर जाये तो
इक हद के आगे दर्द का भी एहसास नहीं रह जाता है
…………………………………………… Shubhashish(2007)
एहसास नहीं रह जाता
31 मईखुदा भी पिघलता है
29 मईजब गम तेरा देख के दिल मुझसे नही सम्भलता है
तो तेरी खुशियों की खातिर ये यूं ही दिन रात जलता है
ऐसे तो सुनता ही नही खुदा दुआ हमारी अक्सर
पर शायद कभी-कभी हमारे आँसुवों से वो भी पिघलता है
…………………………………… Shubhashish(2007)
चरित्रहीन – The call girl
26 मईयौवन के मद में अनियंत्रित, सागर में खो जाने को
आज चला था पैसो से मैं यौवन का सुख पाने को
दिल की धड़कन भी थिरक रही थी यौवन के मोहक बाजे पे
अरमानों के साथ मैं पंहुचा उस तड़ीता के दरवाजे पे
अंदर पंहुचा तो मानो हया ने भी मुँह फेर लिया
चारो तरफ से मुझको यूँ रुपसियों ने था घेर लिया
हर कोई अपने यौवन के श्रृंगार से सुसज्जित था
पर अब जाने क्यों मेरा मॅन थोडा सा लज्जित था
आहत होता था हृदय बहुत उन संबोधन के तीरों से
पर अभी भी मॅन था बंधा हुआ संवेगों की जंजीरों से
तभी एक रूपसी पर अटकी मेरी दृष्टि थी
लगता था मानो स्वयं वही सुन्दरता की सृष्टि थी
व्यग्र हुआ मॅन साथ में उसके स्वयं चरम सुख पाने को
उस कनकलता को लिए चला अपनी कामाग्नि बुझाने को
जून के उष्ण महीने में बसंती सी हो गयी थी रुत
कुछ ऐसे अपने तन को उसने मेरे समुख किया प्रस्तुत
खुला निमंत्रण था सपनो को आलिंगन में भरने का
पर नहीं समझ पा रहा था कारण अपने अंतस के डरने का
अंतस को अनदेखा कर के प्रथम स्पर्श किया तन को
उस मद से ज्यादा मद-मादित अब तक कुछ नहीं लगा मॅन को
खुद अंग ही इतने सुंदर थे लज्जा आ जाये गहनों को
पर सहसा सहम गया देख उस मृग-नयनी के नयनो को
आँखों में कोई चमक नहीं चेहरे पे कोई भाव नहीं
सपने कोई छीन गया जैसे जीने कोई चाह नहीं
प्रश्नों की श्रृंखल कड़ियों ने सारा मद तोड़ दिया पल में
व्याकुल था अंतस जानने को क्या है इसके हृदयातल में
उसे देख अवस्था में ऐसी जब रहा नहीं गया मुझसे
जो उबल रहा था अंतस में वो सब कुछ बोल दिया उससे
आँखे सूना चेहरा सूना क्यों सूना तेरा जीवन है
इच्छाओं के संसार में क्यों अब लगता नहीं तेरा मॅन है
सिर्फ तन का मूल्य दिया हूँ मैं, मॅन पर मेरा अधिकार नहीं
पर इतना तो बता ऐ कनकलता क्या तुझको मैं स्वीकार्य नहीं
हे कामप्रिया!,हे मृगनयनी! ऐसी क्या विवशता है तुझको
जो मॅन से मेरे साथ नहीं फिर तन क्यों सौप दिया मुझको
शांत भाव से बोली वो यहाँ मॅन को कौन समझता है
एक लड़की के लिए गरीबी ही उसकी सबसे बड़ी विवशता है
इतना कह के फिर शांत हो गयी कुछ समझ नहीं आया मुझको
प्रश्नों की श्रृंखल कड़ियों से फिर मैंने झक-झोर दिया उसको
लड़ना ही जीवन है चाहे मुश्किल कितनी भी ज्यादा हो
फिर नारी हो के क्यों तोड़ दिया तुमने अपनी मर्यादा को
कमी नहीं दुनिया में काम की पैसे इज्जत से कमाने को
फिर क्यों बेच दिया खुद को बस अपनी क्षुधा मिटाने को ?
तड़प उठी वो मेरे ऐसे प्रश्नों के आघातों से
मुझसे बोली क्या समझाना चाहते हो इन बातों से
शौक नहीं था वेश्या बन बाज़ारों में बिक जाने का
अपने ही हाथों से खुद अपना आस्तित्व मिटाने का
पर आँखों के सारे सपने एक रोज बह गए पानी में
जब माँ-बाप,घर-आँगन सब खो गए सुनामी में
फिर एक ही रात में बदल गयी मेरी दुनिया की तस्वीर यहाँ
कठपुतली बना के बहुत नचाई मुझको मेरी तक़दीर यहाँ
दिन अच्छे हो जाते हैं राते भी अच्छी लगती हैं
भरे पेट को सिद्धांत की हर बातें अच्छी लगती हैं
पर मई-जून की गर्मी से जब देह झुलसने लगती है
रोटी के टुकड़े खोज रही आँखे कुछ थकने लगती हैं
भूख की आग में तड़प-तड़प मुश्किल से दिन कट पाते हैं
अपनी बेबसी में घुट-घुट कर सपनों को जलाती रातें है
जब नीली छत के सिवा सर पर कोई और छत नहीं होती है
कपडो के छेदों से झाँक रही मजबूरी खुद पे रोती है
गिद्धदृष्टि से देहांश देखता जब कोई चीर-सुराखों से
तब मॅन छलनी हो जाता है तीर विष बुझे लाखों से
जब इन हालातों से लड़ लड़ कर जवानी थकने लगती है
तब मर्यादा और सम्मान की ये बातें बेमानी लगने लगतीं है
लोगो ने जाने कितनी बार मन को निर्वस्त्र कर डाला था
पर फिर भी किसी तरह मैंने अपना तन संभाला था
पर एक दिन कुचल गयी कली कुछ मदमाते क़दमों से
कुछ और नहीं अब बाकी था इन किस्मत के पन्नों में
खुद को ख़त्म कर लेने का निश्चय कर लिया मेरे मॅन ने
पर लाख चाहने पर भी दिल का साथ नहीं दिया हिम्मत ने
पर जीने का मतलब मेरे लिए हर मोड़ पर एक समझौता था
फिर इस जगह से ज्यादा गया गुजरा मेरे लिए क्या हो सकता था
इतना गिर गयी हूँ मैं कैसे ये सवाल हमेशा डसता था
लेकिन मेरे पास भी इसके सिवा अब और कहाँ कोई रस्ता था
उस वक़्त बहुत मैं रोई थी हद से ज्यादा चिल्लाई थी
दूसरों के हाथ आस्तित्वहीन हा जब खुद को मैं पाई थी
पर रो-रो के सारे आंसू एक रोज़ बहा डाला मैंने
हर अरमान का गला घोंट कफ़न ओढा डाला मैंने
पर अब पेट भर जाने पर भी जब नीद नहीं आती रातों को
नहीं सँभाल पता है ये दिल तब इन बिखरे जज्बातों को
क्यों नहीं सजा सकती हूँ मैं दुल्हन बन किसी आँगन को
क्यों प्रेयसी बनने का अधिकार नहीं मिला मुझ अभागन को
काश कि मैं भी किसी को प्राणों से प्यारा कह पाती
काश कि मैं भी किसी के हृदयातल में रह पाती
काश कि मेरे आँचल में भी एक अंश मेरा अपना होता
ममता से पागल हो जाती एक बार जो मुझको माँ कहता
इतना कहते कहते ही उसकी आँखे भर आई थी
मैं भी था खामोश वहाँ बस एक उदासी छाई थी
फिर मुझमे हिम्मत ही नहीं थी उससे कुछ कह पाने को
धीमे क़दमों से लौट गया वापस गंतव्य पे जाने को
सोचता रहा ये रास्ते भर होके मानववृत्ति के अधीन
वो चरित्रहीन थी या फिर दुनिया ही है चरित्रहीन
…………………………………. Shubhashish(2006)
कोशिश न करना कीमत लगाने की
22 मईधोखे से लूट ले जा सकते हो तुम भी,
पर कोशिश न करना कीमत लगाने की,
जिसके बदले में बिक जाये इमान मेरा,
औकात इतनी नहीं अभी इस ज़माने की
……………………….. Shubhashish
गहरा समन्दर है मेरे जज्बात-ए-इश्क का
19 मईकरते हैं वही जो हमारा उसूल है,
युं ही समझ जाओगे हमें तुम्हारी भूल है,
बहुत गहरा समन्दर है मेरे जज्बात-ए-इश्क का,
बिन डुबे इसे नापने कि कोशिश फिजूल है|
……………………………… Shubhashish(2006)
कुछ आदतें नहीं बदलतीं
16 मईभगवान को मानना तो जाने कब से छोड़ दिया है
पर मंदिर के सामने बिना कुछ सोचे ही सर झुक जाता है
कम्बख्त कुछ आदतें लाख चाह के भी नहीं बदलतीं
……..कुछ ऐसा ही तेरी गली से गुजरते हुए भी होता है
बस एक ख्वाब हो तुम
14 मईसच कहू तो बस एक ख्वाब हो तुम,
दोस्ती नही की तुम से कुछ पाने के लिए,
अपनी बातों से बस तुम्हे हॅसाना चाहता हूँ,
क्यूंकि वजह कम है मेरे पास मुस्कुराने के लिये,
ना समझना मुझे परवाना अपनी लौ का,
तुझमें जलने कि मुझको कोई ख्वाहिस नही है,
मैं तो जलके पहले ही आफताब हो गया हूँ,
तेरी दुनियाँ में आया हूं बस जगमगाने के लिये|
………………………… Shubhashish
मैं इमरान हाशमी बनना चाहता हूँ
12 मई
(अपने बी.टेक. फाइनल इयर में जब मैंने ये कविता लिखी थी उस वक़्त unicode जैसी सहूलियत नहीं थी इसलिए मेरे दोस्त कुमार वरुण, जो की इस कविता के प्रेरणा भी थे (क्युकी वो कभी कभी बोलता की यार मैं इमरान हाश्मी बनना चाहता हूँ
) ने इसे हिंदी पैड पे लिख के jpeg फॉर्मेट में मेल में attach किया! आज मैं इसे unicode में यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ )
मैं इमरान हाशमी बनना चाहता हूँ
पांचवी कक्षा की एक क्लास मे मास्टर ने बच्चों से पूछा
बताओ क्या बनोगे, कैसे करोंगे अपने माँ-बाप का नाम ऊँचा
किसी ने IAS. किसी ने PCS. किसी ने कहा अच्छा आदमी बनाना चाहता हूँ
तभी पीछे की सीट से उठकर एक बच्चे ने कहा
Sir! मैं इमरान हाशमी बनना चाहता हूँ
ऐसे जवाब की ख्वाब मे भी नही की थी कभी कल्पना
पर Teacher को लगा शायद हो ये लडके का बचपना
समझाया की बेटा गलती की है तुने Career को चुनने मे
ये तो बता क्या प्रॉब्लम है तुझे और कुछ बनने मे ???
लड़का बोला Sir! जॉब मे अभी कहाँ इतना पैसा है
और Business करना मुझे लगता बेवकूफों जैसा है
नेता फस जाते हैं Akshar स्टिंग ऑपरेशन के जंजाल मे
खेल मे Zahar भर दिया मैच फिक्सिंग के बवाल ने
पर फ़िल्म इंडस्ट्री मे प्रोफिट की लाइन हमेशा ऊपर चढ़ती है
बढ़िया काम से Price-Value तो बुरे से Popularity बढ़ती है
और इस बात को तो ख़ुद कई बड़े फ़िल्म समीक्षक माने है
MMS Clips से भी ज्यादा बिकते इमरान के फिल्मो के गाने है
मै भी ऐसे गाने कर अपनी लाइफ बदलना चाहता हूँ
इसीलिए तो Sir! मैं इमरान हाशमी बनाना चाहता हूँ
हुंह!!!! आज कल के लडके जाने पढ़ते हैं किस किताब से
Teacher का भी सर चक्र गया बच्चे के इस जवाब से
Teacher ने फ़िर भी पूछा उसमे ऐसी क्या बात समाई है
ये तो बता अभिषेक बच्चन बनने मे क्या बुराई है ???
सिर्फ़ दो फिल्मो से इतना नाम नही कमाया अभिषेक के बाप ने
Murder किया लड़किया फ़िर भी कहती .Aashiq Banaya Aap Ne…
मल्लिका,तनुश्री, उदिता निपटी पिछली फिल्मों की साइन मे
सुनाने मे आया है की अब सेलिना हृषिता भी है लाइन मे
मै भी ऐसे टेस्टी CHOCOLATE का स्वाद चखाना चाहता हूँ
इसीलिए तो Sir मैं इमरान हाशमी बनाना चाहता हूँ
अब मास्टर का गुस्सा पहुच गया सातवे आसमान पे
बोले.. सिवाय लड़किया घुमाने के क्या किया इमरान ने ??
Sir! लड़कियों को पीछे घुमाना कोई आसान काम नही
वरना बड़े Powerful लोगो का होता ये अंजाम नहीं
क्या नही जानते आप America के पूर्व राष्ट्रपति को ??
कैसे प्राप्त हुए मोनिका के चक्कर मे .वीरगति को
बदल गया कप्तान देश का सौरभ-नग्मा के टक्कर मे
Cricket खेलना भूल गया वो .नए खेल के चक्कर मे
मेरी इतनी बातों का मतलब बिलकुल सीधा-साफ है
काबिलियेत मे भी इमरान हाशमी. बिल क्लिंटन का बाप है
मैं भी एक Demanded और काबिल आदमी बनाना चाहता हूँ
इसीलिए तो Sir! मैं इमरान हाशमी बनाना चाहता हूँ
…………………………… Shubhashish ( 2006)
माँ
11 मईजो भी जॉब के लिए घर से दूर हैं शायद उन सब के दिल में यही जज्बात होंगे |
ये चार लाईने मैं अपनी माँ के लिए लिखा हूँ, वैसे माँ को याद करने को लिए कोई दिन नहीं होता है माँ तो हमेशा हमारे दिल में रहती हैं हैं लेकिन आज Mother’s Day के बहाने जरुर इन भावनाओ को यहाँ व्यक्त कर रहा हूँ
कभी-कभी खुद अपनी तरक्की से भी हो जाता नाराज हूँ मैं
इसी भाग दौड़ में खुद अपनों से दूर हो गया आज हूँ मैं
जिस आंचल के साये में रह के किसी लायक बन पाया
उस माँ से ही मिलने को चन्द छुट्टी का मोहताज हूँ मैं
……………………………….. Shubhashish
इतनी गैरत नहीं
10 मईइस ज़िन्दगी में तुने पूरी की मेरी कोई हसरत नहीं,
मेरी खुशियों के लिए तू कुछ करे इतनी तुझे गैरत नहीं,
पर हम तो आखिरी दम तक तुझे दुवाएं ही देते जायेंगे,
क्यूंकि धोखा खाना तो मेरी किस्मत है पर धोखा देना मेरी फितरत नहीं|
………………………………………. Shubhashish(2005)











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