चरित्रहीन – The call girl

26 मई

यौवन के मद में अनियंत्रित, सागर में खो जाने को
आज चला था पैसो से मैं यौवन का सुख पाने को

दिल की धड़कन भी थिरक रही थी यौवन के मोहक बाजे पे
अरमानों के साथ मैं पंहुचा उस तड़ीता के दरवाजे पे

अंदर पंहुचा तो मानो हया ने भी मुँह फेर लिया
चारो तरफ से मुझको यूँ रुपसियों ने था घेर लिया

हर कोई अपने यौवन के श्रृंगार से सुसज्जित था
पर अब जाने क्यों मेरा मॅन थोडा सा लज्जित था

आहत होता था हृदय बहुत उन संबोधन के तीरों से
पर अभी भी मॅन था बंधा हुआ संवेगों की जंजीरों से

तभी एक रूपसी पर अटकी मेरी दृष्टि थी
लगता था मानो स्वयं वही सुन्दरता की सृष्टि थी

व्यग्र हुआ मॅन साथ में उसके स्वयं चरम सुख पाने को
उस कनकलता को लिए चला अपनी कामाग्नि बुझाने को

जून के उष्ण महीने में बसंती सी हो गयी थी रुत
कुछ ऐसे अपने तन को उसने मेरे समुख किया प्रस्तुत

खुला निमंत्रण था सपनो को आलिंगन में भरने का
पर नहीं समझ पा रहा था कारण अपने अंतस के डरने का

अंतस को अनदेखा कर के प्रथम स्पर्श किया तन को
उस मद से ज्यादा मद-मादित अब तक कुछ नहीं लगा मॅन को

खुद अंग ही इतने सुंदर थे लज्जा आ जाये गहनों को
पर सहसा सहम गया देख उस मृग-नयनी के नयनो को

आँखों में कोई चमक नहीं चेहरे पे कोई भाव नहीं
सपने कोई छीन गया जैसे जीने कोई चाह नहीं

प्रश्नों की श्रृंखल कड़ियों ने सारा मद तोड़ दिया पल में
व्याकुल था अंतस जानने को क्या है इसके हृदयातल में

उसे देख अवस्था में ऐसी जब रहा नहीं गया मुझसे
जो उबल रहा था अंतस में वो सब कुछ बोल दिया उससे

आँखे सूना चेहरा सूना क्यों सूना तेरा जीवन है
इच्छाओं के संसार में क्यों अब लगता नहीं तेरा मॅन है

सिर्फ तन का मूल्य दिया हूँ मैं, मॅन पर मेरा अधिकार नहीं
पर इतना तो बता ऐ कनकलता क्या तुझको मैं स्वीकार्य नहीं

हे कामप्रिया!,हे मृगनयनी! ऐसी क्या विवशता है तुझको
जो मॅन से मेरे साथ नहीं फिर तन क्यों सौप दिया मुझको

शांत भाव से बोली वो यहाँ मॅन को कौन समझता है
एक लड़की के लिए गरीबी ही उसकी सबसे बड़ी विवशता है

इतना कह के फिर शांत हो गयी कुछ समझ नहीं आया मुझको
प्रश्नों की श्रृंखल कड़ियों से फिर मैंने झक-झोर दिया उसको

लड़ना ही जीवन है चाहे मुश्किल कितनी भी ज्यादा हो
फिर नारी हो के क्यों तोड़ दिया तुमने अपनी मर्यादा को

कमी नहीं दुनिया में काम की पैसे इज्जत से कमाने को
फिर क्यों बेच दिया खुद को बस अपनी क्षुधा मिटाने को ?

तड़प उठी वो मेरे ऐसे प्रश्नों के आघातों से
मुझसे बोली क्या समझाना चाहते हो इन बातों से

शौक नहीं था वेश्या बन बाज़ारों में बिक जाने का
अपने ही हाथों से खुद अपना आस्तित्व मिटाने का

पर आँखों के सारे सपने एक रोज बह गए पानी में
जब माँ-बाप,घर-आँगन सब खो गए सुनामी में

फिर एक ही रात में बदल गयी मेरी दुनिया की तस्वीर यहाँ
कठपुतली बना के बहुत नचाई मुझको मेरी तक़दीर यहाँ

दिन अच्छे हो जाते हैं राते भी अच्छी लगती हैं
भरे पेट को सिद्धांत की हर बातें अच्छी लगती हैं

पर मई-जून की गर्मी से जब देह झुलसने लगती है
रोटी के टुकड़े खोज रही आँखे कुछ थकने लगती हैं

भूख की आग में तड़प-तड़प मुश्किल से दिन कट पाते हैं
अपनी बेबसी में घुट-घुट कर सपनों को जलाती रातें है

जब नीली छत के सिवा सर पर कोई और छत नहीं होती है
कपडो के छेदों से झाँक रही मजबूरी खुद पे रोती है

गिद्धदृष्टि से देहांश देखता जब कोई चीर-सुराखों से
तब मॅन छलनी हो जाता है तीर विष बुझे लाखों से

जब इन हालातों से लड़ लड़ कर जवानी थकने लगती है
तब मर्यादा और सम्मान की ये बातें बेमानी लगने लगतीं है

लोगो ने जाने कितनी बार मन को निर्वस्त्र कर डाला था
पर फिर भी किसी तरह मैंने अपना तन संभाला था

पर एक दिन कुचल गयी कली कुछ मदमाते क़दमों से
कुछ और नहीं अब बाकी था इन किस्मत के पन्नों में

खुद को ख़त्म कर लेने का निश्चय कर लिया मेरे मॅन ने
पर लाख चाहने पर भी दिल का साथ नहीं दिया हिम्मत ने

पर जीने का मतलब मेरे लिए हर मोड़ पर एक समझौता था
फिर इस जगह से ज्यादा गया गुजरा मेरे लिए क्या हो सकता था

इतना गिर गयी हूँ मैं कैसे ये सवाल हमेशा डसता था
लेकिन मेरे पास भी इसके सिवा अब और कहाँ कोई रस्ता था

उस वक़्त बहुत मैं रोई थी हद से ज्यादा चिल्लाई थी
दूसरों के हाथ आस्तित्वहीन हा जब खुद को मैं पाई थी

पर रो-रो के सारे आंसू एक रोज़ बहा डाला मैंने
हर अरमान का गला घोंट कफ़न ओढा डाला मैंने

पर अब पेट भर जाने पर भी जब नीद नहीं आती रातों को
नहीं सँभाल पता है ये दिल तब इन बिखरे जज्बातों को

क्यों नहीं सजा सकती हूँ मैं दुल्हन बन किसी आँगन को
क्यों प्रेयसी बनने का अधिकार नहीं मिला मुझ अभागन को

काश कि मैं भी किसी को प्राणों से प्यारा कह पाती
काश कि मैं भी किसी के हृदयातल में रह पाती

काश कि मेरे आँचल में भी एक अंश मेरा अपना होता
ममता से पागल हो जाती एक बार जो मुझको माँ कहता

इतना कहते कहते ही उसकी आँखे भर आई थी
मैं भी था खामोश वहाँ बस एक उदासी छाई थी

फिर मुझमे हिम्मत ही नहीं थी उससे कुछ कह पाने को
धीमे क़दमों से लौट गया वापस गंतव्य पे जाने को

सोचता रहा ये रास्ते भर होके मानववृत्ति के अधीन
वो चरित्रहीन थी या फिर दुनिया ही है चरित्रहीन

………………………………….  Shubhashish(2006)

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86 Responses to “चरित्रहीन – The call girl”

  1. sushil मई 26, 2008 at 7:09 पूर्वाह्न #

    बहुत सुन्दर रचना। मंटो की याद आ गई।

  2. Muskaan मई 26, 2008 at 10:12 पूर्वाह्न #

    naam kavita ka hai charitraheen….. par kahani batai hai….ek bebas,lachaar ladki ki….. bahut ache se jasbaton ko darshaya hai….wen i completed reading the poem… there was a tear in my eyes!!

  3. mehhekk मई 26, 2008 at 2:24 अपराह्न #

    ek bahut hi bhavsprashi kavita hai,kisike man pe aur vicharon pe hum adhikar nahi jata sakte,aakhir kya hai wo chiz jo ek komal nari man ko un patharili raahon par le jati hai,hope this will end one day.

  4. ramadwivedi मई 27, 2008 at 9:54 पूर्वाह्न #

    vivashtaa insaan se kyaa-kyaa nahi karavati aur kisee ki majbooree kaa fayda uthane walo ki kami nahi hai is duniya me…..hriday ko dravit karne wali kavita hai….yah aneko lachaar ladhkiyo ki kahani hai ….kam hi log likhate hai yese vishaya par…aapane likhaa isake lie aabhar shaayad koi samajh sake inki vevashi??????????

    • sourabh अक्टूबर 14, 2013 at 10:54 पूर्वाह्न #

      Very nice

  5. Manish Kumar मई 27, 2008 at 11:17 पूर्वाह्न #

    Pehli baar aapke blog ko dekha. achcha likha hai aapne.

  6. anurag arya मई 27, 2008 at 1:39 अपराह्न #

    bahut lambi kavita hai…..par apne aap me ek sahasik pryaas hai…..is vishya par sochna aor likhna kabile tareef hai.

  7. Shubhashish Pandey मई 28, 2008 at 1:54 अपराह्न #

    sushil ji, muskaan ji, mehek ji aur anurag ji aap sabhi logo ko tah-e-dil se shukriya.

    manish ji aap ka is blog pe swagat hai umeed hai aage bhi aate rahenge

    rama ji aap ne is kaivta ko padh ke is par apna vichar diya is ke liye bahut bahut dhanyavad.
    aap se bilkul sahmat hoon, agar ek vyakti bhi is kavita ko padh ke un isthitiyon ko aur majbooriyon ko samjh paye to shayad mere liye kafi hoga. maine bhi apne ek dost se ek ghatna sun ke he is kavita ko likha tha . kahan galat nahin hoga ki jin paristhitiyon ko soch ke he hum itna dar jate hain log ye sab jhelte kaise honge

    • amitruhela अगस्त 3, 2013 at 9:29 पूर्वाह्न #

      bahut achhi kavita hai par padh kar man bhar aaya .

  8. ganesh marge मई 31, 2008 at 12:36 अपराह्न #

    bahut sundar likha hai, muze bhi lagta hai ki kucha duniya wale hi (charitrahin) hai

  9. Ami Jha जून 6, 2008 at 8:26 पूर्वाह्न #

    shidhantwadi baatein tabhi achi hoti hai jab pet mein anaaj ho.

    Duniya se garibi to nahi hatayi ja sakti hai pure taur par, par haan sarkar aur hum mil kar bhook ko mitane ki koshish zarror kar sakte hai.

    samaj mein unka kya jo akele hai, jinke koi nahi hai, khaas kar ek abala ka.

    es aor koi kadam kyun nahi uthate hum.

    Aapne bhahut hi acha bhav likha hai.

    sochne aur is oor kuch karne ko prerit karta hai.

  10. Shubhashish Pandey जून 7, 2008 at 11:31 पूर्वाह्न #

    ami ji is kavita ko padhne aur iske bhavon ko samjhne ke liye bahut bahut shukriya .

  11. Prince Sharma जून 24, 2008 at 3:27 पूर्वाह्न #

    Pandit ji,
    Bahur badiyaa…

    Mujhe lagtaa hai shaayad isse behatreen kaveetaa ki shuruaat shaayad hi aaj tak nahi hui hai kitaab ke panno par….

    Badiyaa hai….
    Jeeyo khoob jeeyo…..

    Princ Sharma ” Bechain”

  12. Shubhashish Pandey जून 30, 2008 at 8:59 पूर्वाह्न #

    dhanyavad prince ji aap ki is muqt kanth prasansha ke liye :)

  13. Prabhat Jha सितम्बर 15, 2008 at 5:45 पूर्वाह्न #

    Very touching poem. Your pen is excellent. Keep it up.

  14. Shubhashish Pandey सितम्बर 16, 2008 at 7:22 पूर्वाह्न #

    Thanks a lot Mr. Prabhat

    • AMITA जनवरी 3, 2011 at 6:48 अपराह्न #

      very sad but true reality
      still all criticism for gal!!
      Shubhashish Pandey thank u for putting the pain into rt words!!

      • Shubhashish Pandey 'Aalsi' जनवरी 4, 2011 at 7:29 अपराह्न #

        @Amita ji
        kavita ka sandesh aap tak pahucha
        main aabhari hoon

  15. ashok नवम्बर 1, 2008 at 1:05 अपराह्न #

    this is so buitiful /nice writen shayari on call girls
    so plz send to all .

  16. Shubhashish Pandey नवम्बर 5, 2008 at 6:36 पूर्वाह्न #

    dhanayavad ashok ji

  17. raka नवम्बर 26, 2008 at 4:42 अपराह्न #

    bahut badiya , mamsparshi, savendanou se bharpoor.
    Or ek najariya ,Kamvasna ko ,bhogo ko dekne ka, Ek admi jiske liye duniya ka sabse bada sukh ; wahi ek viashya jiske liye usme koi ras nahi.

  18. Shubhashish Pandey दिसम्बर 7, 2008 at 6:59 अपराह्न #

    in utsahvarshak shabdon ke liye bahut bahut dhanyavad Raka ji

  19. Rajiv L.M. जनवरी 16, 2009 at 11:17 पूर्वाह्न #

    Very Very beautiful poem. It is extrimly superb.
    This type of poem required for the society.
    Write down this type of poen regularly it may be help change the culture of society

    Thanks

    Keep it up

    Rajiv

  20. Shubhashish Pandey जनवरी 18, 2009 at 9:48 पूर्वाह्न #

    bahut bahut shukriya Rajiv ji

  21. kishor फ़रवरी 17, 2009 at 10:47 पूर्वाह्न #

    best shayari

  22. Shubhashish Pandey मार्च 2, 2009 at 7:25 पूर्वाह्न #

    dhanyavad kishor ji

  23. Ravi Malhan जून 19, 2009 at 10:30 पूर्वाह्न #

    bahut bahut aachi rachanhai

    kese dard ko shabdo se nikhara hai

    bahut aache

    • Shubhashish Pandey अगस्त 4, 2009 at 10:57 पूर्वाह्न #

      bahut bahut shukriya Ravi ji

  24. Ravi chaurasia जुलाई 3, 2009 at 5:45 पूर्वाह्न #

    shubhashis, you explained the life of a helpless women in your poem very effectively that can impress anyone to do somthing for such type of wemen.
    so composing such type of poems may become a awereness of our society. so I hope you’ll compose many poems on such other topics.
    I want to suggest you to change the tittle of this poem because this is a compulsion of a helpless women, she is not a characterless.
    thanks for doing somthing for our country.

    • Shubhashish Pandey अगस्त 4, 2009 at 11:00 पूर्वाह्न #

      Thanks Ravi

  25. dileep dixit जनवरी 12, 2010 at 2:17 अपराह्न #

    ye kahani best hai. i chahata hain ki aap esi kahani phir likho

  26. shyam अप्रैल 4, 2010 at 11:34 पूर्वाह्न #

    sahi likha appne esse achhei line kabhi nahi padhi

    thank for its gud luck for nxt

  27. prateek prajapati 8890786000 अप्रैल 7, 2010 at 9:54 पूर्वाह्न #

    क्यों नहीं सजा सकती हूँ मैं दुल्हन बन किसी आँगन को
    क्यों प्रेयसी बनने का अधिकार नहीं मिला मुझ अभागन को

    ye lines bahut achhhi lagi,,,,,,,,,,
    meri to kaha okat aapko kuchhh kahne ki,,,,,,,,,,,
    good bhai good

  28. vandana अप्रैल 22, 2010 at 6:59 पूर्वाह्न #

    hindi mein itni acchi kavita, itne acche dhang se shabdon ko rhyme kiya gaya hai, ye sab aaj kal kam hi padne ko milta. kavita bahut acchi lagi. dil ko chhoo gayi. Garib ladkiyon ko keval jism he samjha jata hai, har koi unka istemal hi karna chahta hai. Aapne bahut hi accha prayas kiya iske liye aapko badhai

  29. sunil goel मई 25, 2010 at 9:09 पूर्वाह्न #

    Sir,
    bahut achhaa likha

  30. Winston Gomez मई 28, 2010 at 10:05 पूर्वाह्न #

    If I had a dime for every time I came to apurn.wordpress.com… Superb writing.

  31. Raj Kumar मई 30, 2010 at 1:18 अपराह्न #

    Great poem Pandy Ji.
    Maine 2 saal waad aaj padi hai.
    Vaise Samasya to bahut acchi tarahe se uthai hai..
    I hope solution ke liye bhi kuch kaho….

  32. Shubhashish Pandey जुलाई 24, 2010 at 7:35 पूर्वाह्न #

    dileep dixit ji, prateek prajapati ji, shyam ji, sunil goel ji, Winston Gomez ji aur raj kumar bhai aap sabhi logo ka in pratikriyaon ke liye tah-e-dil se shukriya.

  33. jyoti prakash singh अगस्त 28, 2010 at 11:19 पूर्वाह्न #

    dard ke tis ko bakhubi ukera hai ,ki ab tak daman dard ki chhito se jakara para hai….dhanyabad

  34. Harshita अगस्त 29, 2010 at 6:13 पूर्वाह्न #

    aaj pehli baar aapka blog pada……..bahut hi khubsurat kavita hai..ise padne k baad mein aapne aansu nahi roke payi

  35. Shubhashish Pandey अगस्त 29, 2010 at 7:05 अपराह्न #

    @Jyoti prakash Singh ji in panktiyon ke liye dhanyavad

    @Harshita ji aap ka swagat hai is blog pe.
    kisi ko kast ho aisa to mera prayojan nahi tha par aapne is kavita ko padha aur iske marm ko samjha iske liye main hriday se aapka abhari hoon.

    • raziya parveen सितम्बर 3, 2010 at 10:55 पूर्वाह्न #

      aapne bahut achha likha kafi gahraiyoon me jake likha hai aapne

      • Shubhashish Pandey सितम्बर 12, 2010 at 7:18 पूर्वाह्न #

        shukriya raziya ji

  36. Harjeet सितम्बर 12, 2010 at 9:07 अपराह्न #

    Aapki aur bhi rachnae padhi par is rachna ka jaab nahi….

    Meri shubhkamnae……

    • Shubhashish Pandey सितम्बर 15, 2010 at 6:36 अपराह्न #

      bahut bahut shukriya Harjeet ji

  37. nimesh मार्च 9, 2011 at 4:20 अपराह्न #

    awesome poem !!!

    • Shubhashish Pandey 'Aalsi' मार्च 9, 2011 at 5:00 अपराह्न #

      @Nimesh ji
      shukriya

  38. Shikha Varshney अप्रैल 5, 2011 at 6:34 अपराह्न #

    अपनी कुछ पुरानी पोस्ट का अवलोकन कर रही थी तो आपके एक कमेन्ट से आपके ब्लॉग तक पहुंची और कुछ कवितायेँ पढ़ीं पर इसने झकझोर कर रख दिया इतनी लंबी कविता होने पर भी पूरी एक ही सांस में पढ़ गई परन्तु क्या प्रतिक्रिया दूं अब तक नहीं समझ पाई हूँ .
    बेहद सच्ची सटीक और सुन्दर अभिव्यक्ति है.

    • anupama pandey अप्रैल 11, 2011 at 5:07 अपराह्न #

      speechless…… gr8 job!!!!

  39. deepak अप्रैल 11, 2011 at 6:37 अपराह्न #

    heart touching , this change my view

  40. Dr.pawan tripathi अप्रैल 20, 2011 at 8:01 अपराह्न #

    bahut khub bahut hi umdaa tarike se likha hai aap ne kya baat hai i am spich less

  41. Shubhashish Pandey 'Aalsi' मई 2, 2011 at 5:34 अपराह्न #

    @Shikha Varshney
    kavita tak aane evam iske bhavon ko samjhne ke liye aabhar.

    @Anupama Pandey ji tah-e-dil se shukriya

    @Deepak ji
    shayad kavita likhna aaj sarthak ho gaya. main ise likh ke yahi sochta tha ki yadi ye kavita kisi ek vyakti ka bhi dristikon badal payee to sarthak ho jayegi
    padhane aur manan karne ke liye bahut bahut dhanayavad

    @Doctor sahab bahut bahut shukriya :)

  42. BHAGAT SINGH PANTHI मई 27, 2011 at 12:52 अपराह्न #

    पहली बार इतनी लम्बी कविता इंटेरेस्ट ले कर पढ़ी. क्या लिखा है. एकदम मोडर्न ब्लॉग.

  43. Shubhashish Pandey 'Aalsi' मई 29, 2011 at 7:38 पूर्वाह्न #

    shukriya Bhagat singh panthi ji

  44. SARVESH PATEL जुलाई 20, 2011 at 7:12 पूर्वाह्न #

    yaar tumhari kavita bahut hi suder hi
    that’s are really nice

  45. Rajeev Vaishy Gwalior india अगस्त 20, 2011 at 8:12 अपराह्न #

    BHRASHTA CHAREYON KA HAI Y चरित्र

  46. pradeep pandey नवम्बर 10, 2011 at 6:56 अपराह्न #

    pandey ji maine aapki kavita charitrahin-the call girl padhi,wah dil ko chhune wale aapke ye bhav…….. ati utam, ye hame sochne par majbur karti hai ki hamare desh mein aisi paristhitiyon ko hum panapne hi na de jisse ki logo ko sifr bhukh ke liye aise kadam uthane pade

  47. techaroundus365 दिसम्बर 16, 2011 at 11:41 पूर्वाह्न #

    Bahut achhi kavita hai.
    Aapne itne jatil vishaya ko itni saralta se shabdo me dhaal diya.
    Main bhi kabhi kabhi likhne ki koshish karta hu par itne samvedansheel vishaya ko sparsh karne ka kabhi sahas nahi hua.
    Aisi rachnao ko padh kar hame bhi hausla milta hai kuch ehsaso ko shabdbadh karne ka.

  48. sumanmeet फ़रवरी 16, 2012 at 10:16 पूर्वाह्न #

    कितनी सच्चाई है इस रचना के हर लफ्ज मे ….इस दुनिया मे दिखता है वही सच नहीं होता …परदे के पीछे की सच्चाई कुछ और ही होती है ….

    बहुत खूब

  49. Shubhashish Pandey 'Aalsi' फ़रवरी 17, 2012 at 12:28 अपराह्न #

    SARVESH PATEL ji , Rajeev Vaishy ji, pradeep pandey ji , techaroundus365 ji evam sumanmeet ji aap sabhi logo ko yahan aane aur apne vicharo ko rakhne ke liye bahut bahut dhanyavad

  50. pyarelal फ़रवरी 18, 2012 at 11:38 पूर्वाह्न #

    बहुत सुदंर रचना ।
    भरे पेट को सिद्दांत की हर बाते अच्छी लगती है।
    रोटी के टुकङे खोज जब रही आँखे तब मर्यादा और सम्मान की ये बाते बेमानी लगने लगती है।

    • Shubhashish Pandey 'Aalsi' सितम्बर 4, 2013 at 2:09 अपराह्न #

      shukriya pyarelal ji

  51. Ashish vishwatma मार्च 10, 2012 at 7:34 अपराह्न #

    Wow …nice….sach me sir is duniya me koi lakh vishvash,aur achaipan ka vishwas dilaye par haqueeqat to yehi h ki sb log usme apne fayde ka % dkhte hai,phir jake ap se matlab rkhenge nhi to nhi….?..?….

  52. Avinash maurya मार्च 17, 2012 at 12:48 पूर्वाह्न #

    Bahut hi achha likha hai.

  53. pawan सितम्बर 6, 2012 at 4:32 अपराह्न #

    i am sad to read this poim

    • pawan&rajneesh दिसम्बर 3, 2012 at 7:00 अपराह्न #

      This types of poem are very emotional & real base in present civilization and I am request to all them persons in the World to give more respect the girls because girls are respected symbol and main element in the life………….?thanks to think the ideas..

  54. राकेश मल्हन rakesh malhan नवम्बर 23, 2012 at 8:46 पूर्वाह्न #

    लाजवाब ….. पर सहसा थम गया पल …. पढते ही इस कविता को ……. क्यों इतना जटिल किया है निर्मल जीवन सरिता को…… क्या हम कुछ कर सकते हैं इस बारे मैं …… या बस खुद अच्छे हों और कैद रहें एक चार दीवारी में….. मन करता है सब ठीक कर दूं …… पर कैसे कर पाउँगा ……..इसीलिए निकल पडा हूँ अब भारत को जगाऊंगा……

    चरित्र निर्माण और भारत उत्थान का पथिक
    राकेश मल्हन

  55. rohitkumargiri दिसम्बर 5, 2012 at 3:23 पूर्वाह्न #

    bahut accha kavita likha hai sir dunia ke muh pe tammacha hai

  56. vinit kumar दिसम्बर 14, 2012 at 6:13 अपराह्न #

    Dil khus ho gya aapki dil me chhupi baat sun kar , Kaun jayada jaankari Lena chahta hai in en jagah pe Jake.

  57. Nihar दिसम्बर 18, 2012 at 6:23 पूर्वाह्न #

    Behtareen Kavita Pandey saab.

  58. Mukesh kumar दिसम्बर 23, 2012 at 2:29 अपराह्न #

    Is kavita ne mere dil ko chhu liya thanks alot

  59. ak जनवरी 12, 2013 at 5:33 अपराह्न #

    nnnnnnnnnnnnooooooooooooooooooooooooooooooooo

  60. Ranjeet choudhary फ़रवरी 3, 2013 at 9:13 पूर्वाह्न #

    Bhut acha

  61. Karam Veer Parjapati फ़रवरी 23, 2013 at 6:30 अपराह्न #

    its speechless sir… hats off to u…..

  62. chetan singh मई 21, 2013 at 6:30 अपराह्न #

    aapne to kavita ke bahane pure manav samaj ko jhakjhor ke rakh dia . bhale hi samaj ke logo ko kadua lage lekin ye purn satyahai. Mazburi hi sab kuchh kara deti hai.

  63. mahaveer जून 18, 2013 at 12:23 अपराह्न #

    lekin kaha samaj pata humara shaby samaj is lachari her admi sochta hai ki gareeb ladaki ki to koi ijjat nahi hoti

  64. chandan जुलाई 19, 2013 at 7:09 पूर्वाह्न #

    Esese achachi kavita aaj tak maine nahi padi

  65. raja अगस्त 20, 2013 at 10:21 पूर्वाह्न #

    hi

  66. saurabh अगस्त 31, 2013 at 1:08 अपराह्न #

    really awesome bhaiya ………

  67. Shubhashish Pandey 'Aalsi' सितम्बर 4, 2013 at 2:15 अपराह्न #

    Ashish ji,
    avinash ji,
    pawan ji,
    rajneesh ji,
    rakesh malhan ji,
    rohit ji,
    vinit ji,
    nihar ji,
    mukesh ji,
    ak ji,
    ranjeet choudhary ji,
    Karam veer ji,
    chetan ji,
    mahaveer ji,
    chandan ji,
    raja ji evam saurabh ji aap sabhi logo ko is blog pe aane, kavita ko padhne tatha apna vichar rakhne ke liye bahut bahut dhanyavad

    • rakesh malhan सितम्बर 5, 2013 at 3:52 पूर्वाह्न #

      अभिनन्दन… कलम की ताकत तलवार से ज्यादा होती है.. इसे चलाते रहिये…

  68. rahul जनवरी 26, 2014 at 10:18 पूर्वाह्न #

    bahut acha likha hai sir aap ne……………..

  69. kamal मार्च 16, 2014 at 11:29 अपराह्न #

    kavita ke ek ek samwat. Dil pe kar gai aghat.
    aapki kavita LOVE YOU hai.

  70. beni prasad मार्च 31, 2014 at 6:24 अपराह्न #

    yar hila kar rakh diya.

  71. krishna netam अप्रैल 6, 2014 at 6:04 अपराह्न #

    very nice

  72. nitin Bhati जुलाई 9, 2014 at 6:15 पूर्वाह्न #

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