ऐसा नहीं की अब सब कुछ बदल गया
पर हाँ हमने खुद को जरुर बदल डाला है
कुछ हासिल नहीं होता छटपटाने से
सो खुद से ही खुद को संभाला है
ऐसा नहीं की अब आग बुझ चुकी है
वो तो आज भी सुलगती है किसी कोने में
हाथ से खोजते थे उसमे जाने क्या खोया हुआ
और ये हाथ अक्सर तब जल जाता था
बुझाने को फूंकते थे जब भी हम उसको
चेहरा एक बार फिर से झुलस जाता था
अब बस यही आदत बदल डाली है तबसे
जाते ही नहीं अब कभी उस कोने में
पर सुबह अपनी आँखे नम मिलने पे समझ आता है
आज क्या ख्वाब देखा है हमने सोने में ??
…………………………. Shubhashish



बहुत सुन्दर!
घुघूती बासूती
बहुत खूब लिखा है ………
bahut achchee abhivyakti hai.
अब बस यही आदत बदल डाली है तबसे
जाते ही नहीं अब कभी उस कोने में
पर सुबह अपनी आँखे नम मिलने पे समझ आता है
आज क्या ख्वाब देखा है हमने सोने में ??
wah bahut khub
बढ़िया भाव हैं.
ghughuti basuti ji, muskan ji, alpana ji , mehek ji aur sameer ji aap sabhi logo ka bahut bahut shukriya.