इश्क ने यहाँ कितनों को कोई और मुकद्दर दिया
दिल को तन्हाई तो आँखों को समंदर दिया
इबादत-ए-इश्क में जिसे पूजते रहे खुदा मान कर
उस कातिल को इस इश्क ने ही तो खंजर दिया
…………………. Shubhashish
इश्क ने यहाँ कितनों को कोई और मुकद्दर दिया
July 2, 2008 by Shubhashish Pandey
Posted in Shayari - Muqtak | Tagged कला, कविता, मुक्तक, शायरी, शुभाशीष, शेर, Kavita, muqtak, shayari, Shayari - Muqtak, Sher, Shubhashish | 6 Comments
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इबादत-ए-इश्क में जिसे पूजते रहे खुदा मान कर
उस कातिल को इस इश्क ने ही तो खंजर दिया
wah bahut bahut khubsurat baat,ishq qatil bhi hai,sahi.
good
bhut sundar. likhate rhe.
बढ़िया है.
उस कातिल को इस इश्क ने ही तो खंजर दिया
” bhut bhut sunder”
Regards
mehek ji , vipin ji , rashmi ji, sameer ji aur seema ji aap sabhi logo ka tah-e-dil se shukriya.