किसी ने अल्लाह कह के मारा किसी ने राम कह के मारा
जो बच गए इससे उन्हें सद्दाम कह के मारा
जो आये थे घर छोड़ शहर दो रोटी कमाने को
“क्यों छिनने आये हो हमारा काम” कह के मारा
कहते हैं जिससे बड़ी नहीं कोई और इबादत दुनिया में
हाँ इसी इश्क करने की खातिर कितनो को सरेआम कर के मारा
………………………………….. Shubhashish
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अच्छी सामयिक रचना है।बधाई।
वाह शुभाशीष बहुत उम्दा, काफी अच्छी पंक्तियाँ है|
इसी सन्दर्भ में मैं भी चार पंक्तियाँ अर्ज़ करता हूँ–
हमे एक घर बनाना था ये हम क्या बना बैठे?
कहीं मंदिर बना बैठे, कहीं मस्जिद बना बैठे..
होती नहीं फिरकापरस्ती परिंदों में क्यूँ?…
कभी मंदिर पे जा बैठे, कभी मस्जिद पे जा बैठे…
शुभाशीष जी भावपूर्ण अभिव्यक्ति….बधाई
असित शुक्ला जी की पंक्तियां बहुत खूब लगी …बहुत बधाई उनके लिए भी….
काफी अच्छी पंक्तियाँ है|
जो बच गए इससे उन्हें सद्दाम कह के मारा…
वाकई काफ़ी कुछ कह गईं ये पंक्तियां…मार ड़ाला…
Bahut Sundar Bhav , Bahut Gahari Soch
परमजीत बाली, asit shukla ji, rama dwivedi ji, vijay ji, रवि कुमार ji,tarun k thakur ji aap sabhi logo ka aabhar
वाह~वाह वाह~वाह ….
dhanyavad shubham ji