तमामो-उलझन और भाग दौड़ से आजिज
जब सुकून खोजता हुआ ये दिल
…जो जानता है की उसके पास
इससे बेहतर कोई तरकीब
तो हो ही नहीं सकती
तो सुकून पाने को ……
ठहर के देर तलक देखता हूँ …….तुझे…….. सिर्फ तुझे
……….. Shubhashish
क्या बताऊँ तुझे उदासी का सबब ऐ दोस्त की एक पूरी उम्र गुजारी जिसके साथ हर लम्हा,
और आज मर गया ……….. वही ख्वाब
………….Shubhashish
Tags: कविता, मुक्तक, शायरी, शुभाशीष, शेर, hindi poetry, Shubhashish, shubhashish pandey




कुछ विचारों के घर में ठहर जाने से सुकून मिलता है।
aapne sahi kaha praveen ji
kavita tak aane ke liye shukriya
आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आई हूँ ..बहुत अच्छा लगा …अन्तिम पंक्तियाँ मन को छू गई ….
suman ji swagat hai aap ka
aap ne panktiyan pasand ki iske liye dhanyavad