Posted in Kavita, tagged कला, कविता, मुक्तक, शायरी, शुभाशीष, शेर, Kavita, muqtak, shayari, Shayari - Muqtak, Sher, Shubhashish on June 30, 2008 | 6 Comments »
ऐसा नहीं की अब सब कुछ बदल गया
पर हाँ हमने खुद को जरुर बदल डाला है
कुछ हासिल नहीं होता छटपटाने से
सो खुद से ही खुद को संभाला है
ऐसा नहीं की अब आग बुझ चुकी है
वो तो आज भी सुलगती है किसी कोने में
हाथ से खोजते थे उसमे जाने क्या खोया हुआ
और ये हाथ अक्सर तब [...]
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Posted in Kavita, tagged कला on June 4, 2008 | 5 Comments »
रोज बढ़ते हुए sensex के ज्वार में
हम भी खोये थे Rising India के खुमार में
आने वाले टाइम में इंडिया दुनिया में छा जाएगा
चीन, जापान, अमेरिका हर कोई बस मुह देखता रह जायेगा
कुछ इन्ही बातों पे कार के अंदर बहस छीड़ी थी
किसे परवाह की ट्रैफिक सिग्नल पे कितनी भीड़ खड़ी थी
तभी किसी ने कार के शीशे [...]
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Posted in Kavita, tagged Shubhashish, Sher, Kavita, कला, शेर, कविता, शुभाशीष, मुक्तक, muqtak, shayari, Shayari - Muqtak, शायरी on June 2, 2008 | 6 Comments »
समझ नहीं आता की क्या कर डालूँ मैं
तुम्हें बदलने की कोशिश करूं या खुद को बदल डालूँ मैं
अब और यही दर्द नहीं सहा जाता मुझसे
दम तोड़ने दूं या खुद को संभालूँ मैं
जाने कब से बरसने को तरसते हैं बादल
रोकूँ उन्हें या अपना दामन भीगा डालूँ मैं
जीने नहीं देती, पर तेरी यही एक निशानी बाकी [...]
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Posted in Kavita, tagged Shubhashish, Sher, Kavita, कला, शेर, कविता, शुभाशीष, मुक्तक, muqtak, shayari, Shayari - Muqtak, शायरी, the call girl, charitraheen, चरित्रहीन, hindi poem, hindi poetry on May 26, 2008 | 12 Comments »
यौवन के मद में अनियंत्रित, सागर में खो जाने को
आज चला था पैसो से मैं यौवन का सुख पाने को
दिल की धड़कन भी थिरक रही थी यौवन के मोहक बाजे पे
अरमानों के साथ मैं पंहुचा उस तड़ीता के दरवाजे पे
अंदर पंहुचा तो मानो हया ने भी मुँह फेर लिया
चारो तरफ से मुझको यूँ रुपसियों ने [...]
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Posted in Hasya kavita, Kavita, hasya vyang, tagged Shubhashish, कला, शेर, कविता, शुभाशीष, मुक्तक, hasya kavita, हास्य कविता, hasya vyang, हास्य व्यंग, हास्य, जुली, hasya, मैं इमरान हाशमी बनना, main imraan haashmi banna chahta hoon, imraan hashmi, imraan, imran, amitabh, bachchan, bill clinton, बिल क्लिंटन, CHOCOLATE, अभिषेक, मल्लिका, तनुश्री, उदिता, mallika sheravat on May 12, 2008 | 12 Comments »
(अपने बी.टेक. फाइनल इयर में जब मैंने ये कविता लिखी थी उस वक़्त unicode जैसी सहूलियत नहीं थी इसलिए मेरे दोस्त कुमार वरुण, जो की इस कविता के प्रेरणा भी थे (क्युकी वो कभी कभी बोलता की यार मैं इमरान हाश्मी बनना चाहता हूँ ) ने इसे हिंदी पैड पे लिख के jpeg [...]
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