Archive | मार्च, 2008

ख्वाब और हकीकत

31 मार्च

ख्वाब और हकीकत मे बडा फासला है,
केवल ख्वाब देखने से किसे क्या मिला है,
हमारा ही कुसूर था जो किसी ख्वाब को हकीकत समझा,
खुद पे शर्मिदां हूँ, अब तुमसे कहाँ गिला है,
…………………………… Shubhashish(2003)

हर बार

31 मार्च

हर मोड पर खुद को अकेला पाते हैं,
हर बार खुद से कुछ वादा कर जाते हैं,
हर बार लगता है शायद ये आखरी बार है,
पर हर बार हम जीतते-जीतते हार जाते हैं|
………………………….. Shubhashish(2003)

सीख लेते हैं लोग

31 मार्च

शीशे की तरह टूट जाना हर ख्वाब का अंजाम है,
मुरझा के गिर जाना हर फूल का अंजाम है,
चीर देती हैं लहरें चट्टानों का भी सीना,
सीख लेते हैं लोग गम के साये मे जीना,
कर के आसूओं में दफन अपने दिल के अरमान को,
लोग जीते हैं ऐसे जैसे जिंदगी पे एहसान हो,
………………………….. Shubhashish(2001)

क्यों ऐसा बना दिया

30 मार्च

क्यों मेरी जिन्दगी को ऐसा बना दिया,
दुख के कफन में मुझे जिंदा जला दिया,
मोहब्बत के ख्वाब में हकीकत जल गयी,
सुकुन के ख्वाब मे सबकुछ गवां दिया|
क्या रात और क्या दिन सब एक ही से लगते हैं,
रोते-रोते तेरी याद में खुद खो भूला दिया,
बीते पल का हिसाब रखते हैं नये पल गम ही देते हैं,
बीते पल को ही खुद का नसीब बना दिया|
……………………………Shubhashish(2001)

इन्तजार…

30 मार्च

इतना ना तडपाओ कि दर्द के भी आँसू छलक जायें,
ये सजा मत दो प्यार मे कि हम दर्द की परिभाषा बन जायें,
युँ जला कर, गम दे कर, तडपा कर,
इतना मत इन्तजार करवाओ कि आँखें समय का पैमाना बन जायें |
………………………………….. Shubhashish(2000)

गर था ले रहा तु इम्तेहा

29 मार्च

अब टुट के गिर गया हू,
तो क्यों नहीं फिर उठा रहा,
गर था ले रहा तु इम्तेहा तो,
अब जीत का एहसास क्यों नहीं दिला रहा,
हम तो हार गये,
और कर रहे हैं इल्तजा,
तो तु मेरे पास फिर,
क्यों नहीं आ रहा,

मेरी सासें हो रही हैं धीरे,
खत्म हो रही है धडकन,
क्यों नहीं तु मेरी,
सदा सुन पा रहा,
हम तो पागल से हो गये हैं,
अपना सब कुछ गवां कर,
अब क्यों नहीं,
तु मुझे अपना रहा |
…………… Shubhashish(2000)

हमारा मुकद्दर

28 मार्च

जिंदगी की परिस्थितियाँ मजबूर करतीं हैं अगर,
तो आ छोड दे हम ये जहाँ,
मिल जायें मौत से हम अगर,
तो मौत ही होगी हमारा मुकद्दर |
……………………….. Shubhashish(2000)