गुमसुम सी तनहाइयों मे

25 मार्च

गुमसुम सी तनहाइयों मे जैसे कोई छू जाता है,
अपने यहीं पे होने का एहसास दिलाता है,
तडप उठता है बेचैन दिल तुम से मिलने के लिये,
आँसु आँखों मे छूपाये फिर सहम जाता है |
…………………………Shubhashish(1998)

4 Responses to “गुमसुम सी तनहाइयों मे”

  1. pankaj अप्रैल 10, 2008 at 10:13 पूर्वाह्न #

    मन को है तुझे देखने की प्यास
    तूझ बिन बेचैन है मेरी हर एक सांस
    उस एक क्षण के लिए छोड॰ सकता हूं ये जहाँ
    जिस पल मे हो तेरी नजदीकी का एहसास

  2. satish दिसम्बर 6, 2008 at 10:17 पूर्वाह्न #

    good

  3. Shubhashish Pandey दिसम्बर 7, 2008 at 6:54 अपराह्न #

    dhanyavad satish ji

  4. M. haryanvi फ़रवरी 20, 2009 at 4:01 पूर्वाह्न #

    Very good yar

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