इश्क भी क्या चीज़ है

11 जून

“अरे इतनी सी बात पे परेशान होने की क्या जरुरत ये लो तुम मेरी फाइल दिखा देना,हाँ मेरी राइटिंग थोडी गन्दी है” अनुराग ने मुस्कुराते हुए सुबह से परेशान भावना की ओर अपनी फाइल बढ़ा दी, भावना को समझ नहीं आ रहा था की वो क्या करे| “अरे ! नहीं अनुराग तुमने साल भर मेंहनत कर के ये फाइल बनायीं है और अगर आज मेरी लापरवाही की वजह से तुम्हारे लिए कोई परेशानी होगी तो शायद मुझे अच्छा नहीं लगेगा| अगर मैंने ध्यान रखा होता तो वो फाइल गुम ना हुई होती ” अरे! come-on भावना बच्चो जैसी बात मत करो आज तुम्हे जरुरत है इसलिए दे रहा हूँ ऐसे भी मेरा टर्न कल है तब तक मैं बना लूँगा फाइल” शायद इस अपनेपन को भावना नकार नहीं सकती थी ऊपर से जरुरत ने उसे और मजबूर कर दिया | “अरे चलो कैंटीन में कुछ खाते हैं यार मुझे बहुत भूख लग रही है” अनुराग के इस बात से सब सहमत हो गए उनके पूरे छ: लोगो का ग्रुप कैंटीन की कोने वाली टेबल पर बैठ के आर्डर का इंतजार करने लगा|

भावना आज खामोश थी उसके सर का बोझ तो हट गया था पर दिल बहुत भारी था| लोग अपनी बातो में मस्त थे पर वो लगातार अनुराग को देखे जा रही थी | जुबान से खामोश मगर अन्दर जाने कितना तूफान | आखिरकार आँखों ने अनुराग के सामने सवाल उढ़ेल ही दिए “क्यों तुम मुझे एहसान से लादे जा रहे हो पहले के एहसान क्या कम हैं मुझ पर जो आज एक और दे दिया | क्यों नहीं कभी कुछ मांग लेते मुझसे, क्यों नहीं मेरे दिल को ये एहसास होने देते की मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकती, इतना प्यार करते हो पर कभी अपनी आँखों से भी नहीं ज़ाहीर होने देते | हाँ, मैं कुछ नहीं दे सकती तुम्हे पर मैं ये एक बार तुम्हारे सामने स्वीकार करना चाहती हूँ | तुम्हारे एहसानो का बोझ बहुत भारी है | इसे लेके अब और नहीं चला जाता मुझ से ”

भावना के दिमाग की इन सारी बातों को जैसे अनुराग ने साफ सुन लिया हो | बहुत ही सहज भाव से उसने भावना की आँखों में देख एक हल्की सी मुस्कराहट से ही जवाब दे दिया “हाँ मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ पर क्या प्यार बस पाने का ही नाम है अगर हाँ तो तुमसे बहुत ज्यादा मैंने पाया है तुम्हारे लिए कुछ भी कर पाने का सुकून मुझे जाने कितने दिनों तक खुश रखता है | तुमसे मांग मैं प्यार को छोटा नहीं कर सकता मैं तुम्हे, तुम्हारी मजबूरिया सब कुछ समझता हूँ | मुझे जो चाहिए वो मुझे तुम अनजाने में ही दे देती हो| तुम्हारी ख़ुशी से ज्यादा मुझे क्या चाहिए होगा | तुम्हारी ख़ुशी शायद तुम्हे भी उतना खुश न करती हो जितना मुझे कर देती है | और इस वक़्त भी मैं तुम्हे हँसता हुआ देखना चाहता हूँ | सच में बस एक बार मुस्कुरा दो ना मेरे लिए, लो मांग भी लिया अब न कहना की कुछ माँगा नहीं “| बात आँखों में हुई थीं पर भावना की आँखों में आंसू और होठो पे मुस्कान थी

……….. ये इश्क भी क्या चीज़ है |

यूँ तो इश्क हो जाता है बस चन्द कदम साथ चलकर के
पर ये मोम नहीं जो खत्म हो जाये बस थोडी देर जल कर के
लकडी जल कर कुछ देर में ही कोयला हो जाया करती है
पर कोयले से हीरा बनता है सैकडो साल घुटन सह कर के
……………………… Shubhashish

नोट : – हीरा कोयले का ही अपरूप होता है, जब कोयला कई सौ सालों तक ज़मीन में दबा रहता है तो उसकी आण्विक संरचना परिवर्तित हो जाती है और धीरे-धीरे वो कोयले से हीरा बन जाता है |

41 Responses to “इश्क भी क्या चीज़ है”

  1. Muskaan जून 11, 2008 at 11:55 पूर्वाह्न #

    kya khoob!!
    kahin wo anurag babu tum to nahi?? pata hai kavi log bahut khoob sonchte hai… par ye bhaavnaaye to….mehsoos karne wale hi spasht roop se darsha sakte hai… aisa mera maanna hai
    anyways a masterpiece again!!

  2. sameerlal जून 11, 2008 at 2:31 अपराह्न #

    इश्क भी क्या चीज है-बहुत बढ़िया.

  3. mehek जून 11, 2008 at 5:30 अपराह्न #

    kahani bhi hira aur sath ki khubsurat panktiyan bhi,ishq pana nahi hameesha ,sahi baat,ek sundar post ke liye bahut badhai,aap to achhe khase kahanikar bhi hai

  4. ramadwivedi जून 12, 2008 at 5:50 पूर्वाह्न #

    डा. रमा द्विवेदी said…

    बहुत खूब शुभाशीष जी,संवेदना से लबालब…प्यार नाम देने का ही है…दिल को छू गईं अंतिम पंक्तियां….मुबारकवाद…

  5. Shubhashish Pandey जून 12, 2008 at 5:59 पूर्वाह्न #

    dhanyavad muskan ji, waise ye meri kahani nahin hai ye to meri kalpna hai, haan ye sach hai ki kavi aksar do tarike ke ehsason ko panne pe utarte hain pahla ki kash aisa hota ya aisa hota to… aur doosra kash koi ise samjh pata . ab mere liye ye pale wale me se hai agar aisa hota to ….🙂
    aap ki pratikriya ke liye dhanyavad

    dhanayavad sameer ji aap ki is hausla-afjayi ke liye.

    dhanyavad mehek ji lekin maine kahani nahni bas ek paristhiti likhi thi jisse aakhri ki char panktiyon ko thoda vajan ke sath rakh sakoon , kahani likhna to aaj bhi sapna he hai🙂

    dhanyavad Dr. Rama ji , aap ko ye panktiyan pasnad aayin , aabhar.

  6. Chandrashekhar Pandey जून 12, 2008 at 12:33 अपराह्न #

    Hello Bhai Kya likha hai tune sahi main pyar samajhne ki hi cheez hoti hai paane ki nahi mil jaye to sone pe suhaga na mile to sirf SONA HI SONA…….. HA HA H AH H AH AH AH AHA
    Take care GOD BLESS YOU……..

  7. jeetu जून 14, 2008 at 4:43 पूर्वाह्न #

    ispe koi tippani nahiin kia ja sakta…

    bas इश्क भी क्या चीज है !!!

    kyon ke इश्क shabdoon ka mohtaaz nahiin hai….

    -jr

  8. prerana जून 18, 2008 at 5:08 पूर्वाह्न #

    nice one !!
    waise shubhashish ….yeh anurag toh tum ho par yeh bhawna kaun thi yaar kabhi bataya nahi…🙂
    ab toh bata do.

  9. Shubhashish Pandey जून 21, 2008 at 2:03 अपराह्न #

    dhanyavad chandrashekhar babu.
    dhanyavad jeetu ji.

    @prerana

    ab hum bhavna ke baare me kahan se bata dein even mujhe to aap bata rahi hain ki anurag hum hain agar pahle pata hota ki anurag hum hain to use itna achha admi to nahin he show karte😉 . waise agar main anurag hoon to ab bhavana bhi bata he do ki kaun hai .( yar kisi achhi bandi ka naam batana😛 )

  10. Ankesh Tyagi जुलाई 2, 2008 at 5:32 पूर्वाह्न #

    Pehle to pandey ji aapko saadar Pranaam…
    Aap ki iss bhaavavyakti ke liye aap ko bhadhai. Atyant Utkrisht rachna….”पर कोयले से हीरा बनता है सैकडो साल घुटन सह कर के”….isse se achcha bhaav hamein to nahi soojh raha inn bhavnaon ko vyakat karne ke liye…

  11. Shubhashish Pandey जुलाई 2, 2008 at 11:40 पूर्वाह्न #

    tyagi ji is hauslafzayi ke liye bahut bahut shukriya🙂 .

  12. Shikha जुलाई 9, 2008 at 7:29 पूर्वाह्न #

    Ghazab Bhaiya, kya likha hai.
    lekin ye to batao, mere liye kitaab kab likhoge?

  13. Shubhashish Pandey जुलाई 10, 2008 at 11:44 पूर्वाह्न #

    thanks shikha

    are ghabrao mat, kabhi na kabhi to kitab ban he jayegi🙂

  14. mayank sharma जुलाई 18, 2008 at 5:30 पूर्वाह्न #

    yaar just grt you are doing a great job congratulation

  15. mayank sharma जुलाई 18, 2008 at 5:32 पूर्वाह्न #

    aur ye bataiya julie kaun hai

  16. Shubhashish Pandey जुलाई 21, 2008 at 6:19 पूर्वाह्न #

    dhnayvad mayank ji

    julie ka pura parichay to us kavita me hai ab bhi kya batana padega ki kaun hai ?🙂

  17. Tarun Gupta अगस्त 11, 2008 at 7:10 पूर्वाह्न #

    Wah ! Pandey bhaiya…kya likha hai…aur shabdo ka chayan to bahut hi accha hai🙂

  18. Shubhashish Pandey अगस्त 12, 2008 at 5:04 पूर्वाह्न #

    dhanyavad tarun bhai

  19. ramesharya सितम्बर 9, 2008 at 10:17 पूर्वाह्न #

    ek diwana kitna kuch blidan krta h pyar me….han yhi pyar h….scha or pawn prem h…

  20. Shrish सितम्बर 10, 2008 at 11:28 पूर्वाह्न #

    Guru Jee pranam,
    Guru jee main aapko kya bolu ..aapney jo do pyaar karney walon key aankhon ki jubaan ko jo sabdo main piroroya hain……
    dil ko chuney wali panktiya hain
    Shrish

  21. Shubhashish Pandey सितम्बर 11, 2008 at 4:22 अपराह्न #

    ramesh ji aur shrish ji in shabdon ke liye bahut bahut dhanyavad🙂

  22. gourav फ़रवरी 13, 2009 at 11:37 पूर्वाह्न #

    exxcellent its define my love my word jiske liye mai aaj bhi intejaar kar raha hoo kash vo mujhse ek naajar dikh jaaye. reaaly owesome great.

  23. Shubhashish Pandey फ़रवरी 16, 2009 at 6:57 पूर्वाह्न #

    bahut bahut dhanayavad Gaurav ji

  24. Asit अक्टूबर 2, 2009 at 11:00 पूर्वाह्न #

    waah shubhashishi ji ;)….kya panktiyaan likhi hai aap ne…wah wah…parantu sabse jyaanvardhak to aapka note tha😀

  25. Asit अक्टूबर 2, 2009 at 2:00 अपराह्न #

    ye wala:-

    नोट : – हीरा कोयले का ही अपरूप होता है, जब कोयला कई सौ सालों तक ज़मीन में दबा रहता है तो उसकी आण्विक संरचना परिवर्तित हो जाती है और धीरे-धीरे वो कोयले से हीरा बन जाता है | :p

    • Shubhashish Pandey अक्टूबर 2, 2009 at 2:30 अपराह्न #

      ha ha ha haan bhai thodi technical details deni padti hai logic ko dikhane k liye😛

      • Asit अक्टूबर 2, 2009 at 2:55 अपराह्न #

        hmmm

  26. arvind अक्टूबर 2, 2009 at 3:22 अपराह्न #

    बहुत खूब. बहुत सुन्दर कहानी है पाण्डेय भाई.
    नोट भी बहुत खुबसूरत लगा हमे.

    • Shubhashish Pandey अक्टूबर 2, 2009 at 3:26 अपराह्न #

      धन्यवाद, आज सब लोग इस नोट के पीछे क्यों पड़ रहे हैं🙂

  27. ashwani फ़रवरी 22, 2010 at 6:41 अपराह्न #

    really amazing…

  28. arjun raj मार्च 20, 2010 at 3:01 अपराह्न #

    बहुत खूब. बहुत सुन्दर कहानी है पाण्डेय भाई.
    नोट भी बहुत खुबसूरत लगा हमे.

  29. Shubhashish Pandey जुलाई 24, 2010 at 7:37 पूर्वाह्न #

    ashwani ji aur arjun raj bhai aap logo ka bahut bahut shukriya

  30. harshita अगस्त 31, 2010 at 3:03 अपराह्न #

    really yeh kavita hamare dil ko chu gayi……..shubhashish ji aise hi kavita likhte rahiye…may all ur dreams n wishes come true
    ek baat puchna chahte hain aapke is blog ka naam apurn kyun hai???

    • Shubhashish Pandey अगस्त 31, 2010 at 3:17 अपराह्न #

      tarif ke liye shukrya

      blog ka naam apurn kyu hain ye “About” section me maine spast kar diya hai :
      मन की सारी संवेदनायें जब खुद के लिये शब्द ढूंढने को निकलती है तो अंत मे सिर्फ एक ही शब्द मिलता है और वो है ‘अपूर्ण (अधूरा) ‘ । मै नहीं जानता कि यही एहसास हर किसी को होता है या नहीं, पर कभी-कभी जब रात के सन्नाटे में मै काले और शांत आकाश को देखता हूँ तो जाने क्यों एक अजीब से अधूरेपन का एहसास दिल को चाक कर जाता है। और फिर शुरु होता है सिलसिला खुद से सवाल-जवाब का। पर सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि….. आखिर क्यो हैं ये एहसास……..एक अधूरापन…….एक Incompleteness….

  31. Harshita सितम्बर 1, 2010 at 1:49 अपराह्न #

    Shubhashish ji aapke baaton se yeh lagta hai ki…there is something in your life that u miss a lot..that’s why this incompleteness is there…………

    • Shubhashish Pandey सितम्बर 2, 2010 at 7:29 पूर्वाह्न #

      Something is missing…… but what… I dont know..

  32. Harshita सितम्बर 2, 2010 at 8:56 पूर्वाह्न #

    ek baat kahain agar aapko kavitain likhne se fursat mile toh kabhi akele mein baith kar sochiaga apne is adhurepan k baare mein …..definetely u will get ur answer & i am sorry for my interference in ur life….

    • Shubhashish Pandey सितम्बर 2, 2010 at 9:50 पूर्वाह्न #

      बहुत बहुत शुक्रिया हर्षिता जी इतना समय देने के लिए
      मैं क्षमा चाहूँगा पर मेरी विश्लेषण क्षमता शायद इतनी नहीं
      क्यूंकि मुझे अकेले बैठ के सोचना तो बहुत अच्छा लगता है पर लाख सोचने पर भी आज तक इन सवालों के जवाब नहीं ढूंढ़ पाया हूँ! अंत में झल्लाहट में जो कुछ निकलता है वो कभी कविता होती है कभी शेर ……… पर जवाब आज तक नहीं मिला ……… शायद जिस दिन जवाब मिल जाये ये कलम छूट जाएगी

  33. Pushkar Chaubey जनवरी 13, 2011 at 9:55 पूर्वाह्न #

    very touching..

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: