किसी कोने में

30 जून

ऐसा नहीं की अब सब कुछ बदल गया
पर हाँ हमने खुद को जरुर बदल डाला है

कुछ हासिल नहीं होता छटपटाने से
सो खुद से ही खुद को संभाला है

ऐसा नहीं की अब आग बुझ चुकी है
वो तो आज भी सुलगती है किसी कोने में

हाथ से खोजते थे उसमे जाने क्या खोया हुआ
और ये हाथ अक्सर तब जल जाता था

बुझाने को फूंकते थे जब भी हम उसको
चेहरा एक बार फिर से झुलस जाता था

अब बस यही आदत बदल डाली है तबसे
जाते ही नहीं अब कभी उस कोने में

पर सुबह अपनी आँखे नम मिलने पे समझ आता है
आज क्या ख्वाब देखा है हमने सोने में ??

…………………………. Shubhashish

6 Responses to “किसी कोने में”

  1. ghughutibasuti जून 30, 2008 at 9:17 पूर्वाह्न #

    बहुत सुन्दर!
    घुघूती बासूती

  2. kmuskan जून 30, 2008 at 10:07 पूर्वाह्न #

    बहुत खूब लिखा है ………

  3. alpana जून 30, 2008 at 11:13 पूर्वाह्न #

    bahut achchee abhivyakti hai.

  4. mehek जून 30, 2008 at 1:53 अपराह्न #

    अब बस यही आदत बदल डाली है तबसे
    जाते ही नहीं अब कभी उस कोने में

    पर सुबह अपनी आँखे नम मिलने पे समझ आता है
    आज क्या ख्वाब देखा है हमने सोने में ??

    wah bahut khub

  5. समीर लाल जून 30, 2008 at 10:25 अपराह्न #

    बढ़िया भाव हैं.

  6. Shubhashish Pandey जुलाई 1, 2008 at 10:33 पूर्वाह्न #

    ghughuti basuti ji, muskan ji, alpana ji , mehek ji aur sameer ji aap sabhi logo ka bahut bahut shukriya.

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