किसी ने अल्लाह कह के मारा किसी ने राम कह के मारा

17 दिसम्बर

किसी ने अल्लाह कह के मारा किसी ने राम कह के मारा
जो बच गए इससे उन्हें सद्दाम कह के मारा
जो आये थे घर छोड़ शहर दो रोटी कमाने को
“क्यों छिनने आये हो हमारा काम” कह के मारा
कहते हैं जिससे बड़ी नहीं कोई और इबादत दुनिया में
हाँ इसी इश्क करने की खातिर कितनो को सरेआम कर के मारा
 ………………………………….. Shubhashish

9 Responses to “किसी ने अल्लाह कह के मारा किसी ने राम कह के मारा”

  1. परमजीत बाली दिसम्बर 17, 2009 at 10:14 पूर्वाह्न #

    अच्छी सामयिक रचना है।बधाई।

  2. Asit Shukla दिसम्बर 17, 2009 at 1:53 अपराह्न #

    वाह शुभाशीष बहुत उम्दा, काफी अच्छी पंक्तियाँ है|

    इसी सन्दर्भ में मैं भी चार पंक्तियाँ अर्ज़ करता हूँ–

    हमे एक घर बनाना था ये हम क्या बना बैठे?
    कहीं मंदिर बना बैठे, कहीं मस्जिद बना बैठे..
    होती नहीं फिरकापरस्ती परिंदों में क्यूँ?…
    कभी मंदिर पे जा बैठे, कभी मस्जिद पे जा बैठे…

  3. ramadwivedi दिसम्बर 17, 2009 at 6:16 अपराह्न #

    शुभाशीष जी भावपूर्ण अभिव्यक्ति….बधाई

    असित शुक्ला जी की पंक्तियां बहुत खूब लगी …बहुत बधाई उनके लिए भी….

  4. vijay दिसम्बर 18, 2009 at 1:46 पूर्वाह्न #

    काफी अच्छी पंक्तियाँ है|

  5. रवि कुमार, रावतभाटा दिसम्बर 18, 2009 at 5:29 अपराह्न #

    जो बच गए इससे उन्हें सद्दाम कह के मारा…

    वाकई काफ़ी कुछ कह गईं ये पंक्तियां…मार ड़ाला…

  6. Shubhashish Pandey जुलाई 24, 2010 at 7:19 पूर्वाह्न #

    परमजीत बाली, asit shukla ji, rama dwivedi ji, vijay ji, रवि कुमार ji,tarun k thakur ji aap sabhi logo ka aabhar

  7. SHUBHAM अगस्त 13, 2010 at 10:26 पूर्वाह्न #

    वाह~वाह वाह~वाह ….

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