Archive | अक्टूबर, 2010

ख्वाहिश

14 अक्टूबर

बेसबब जूझना थकना और फिर से खुद से लड़ जाना
टूट जाने की हद तक चुप-चाप हर गम को सह जाना
तब होती है उसकी बाँहों में बिखर जाने की वो ज़िन्दगी सी तलब
पर आखिरी ख्वाहिश की तरह उस ख्वाहिश का भी आखिर तक रह जाना
…………………………… Shubhashish

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सुकून

5 अक्टूबर

तमामो-उलझन और भाग दौड़ से आजिज
जब सुकून खोजता हुआ ये दिल
…जो जानता है की उसके पास
इससे बेहतर कोई तरकीब
तो हो ही नहीं सकती

तो सुकून पाने को ……
ठहर के देर तलक देखता हूँ …….तुझे…….. सिर्फ तुझे
……….. Shubhashish

क्या बताऊँ तुझे उदासी का सबब ऐ दोस्त की एक पूरी उम्र गुजारी जिसके साथ हर लम्हा,
और आज मर गया ……….. वही ख्वाब
………….Shubhashish