Archive | दिसम्बर, 2015

यूँ हीं…. (3)

19 दिसम्बर

  1. मेरी खामोशियाँ अब भी उससे उम्मीद किए बैठी है
    जो मेरी आवाज़ो को भी अनसुना कर दिया करता है
    ………………………………… Shubhashish
  2. बेहतर है खुद मे ही घुट के फना हो जाऊं मैं
    कहीं ये दर्द बाहर आया तो कयामत होगी
    ………………………………… Shubhashish
  3. ऐ गजल
    बस एक तूही तो है जिससे मैं शिकायत करता हूँ
    बाकी दुनिया तो बहुत है मेरी अपनो जैसी
    ………………………………… Shubhashish
  4. भली है लाश जो जल्द ही जल जानी है
    बुरी तो होती हैं बिना नींद की आँखे
    ………………………………… Shubhashish
  5. कुसूर किसका कहु इस बेबसी को मैं
    कि तू डूब रहा है मगर प्यासा प्यासा
    ………………………………… Shubhashish