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यूँ हीं…. (3)

19 दिसम्बर

  1. मेरी खामोशियाँ अब भी उससे उम्मीद किए बैठी है
    जो मेरी आवाज़ो को भी अनसुना कर दिया करता है
    ………………………………… Shubhashish
  2. बेहतर है खुद मे ही घुट के फना हो जाऊं मैं
    कहीं ये दर्द बाहर आया तो कयामत होगी
    ………………………………… Shubhashish
  3. ऐ गजल
    बस एक तूही तो है जिससे मैं शिकायत करता हूँ
    बाकी दुनिया तो बहुत है मेरी अपनो जैसी
    ………………………………… Shubhashish
  4. भली है लाश जो जल्द ही जल जानी है
    बुरी तो होती हैं बिना नींद की आँखे
    ………………………………… Shubhashish
  5. कुसूर किसका कहु इस बेबसी को मैं
    कि तू डूब रहा है मगर प्यासा प्यासा
    ………………………………… Shubhashish

ज़ज्बात

25 जनवरी

अड़ा बैठा है वो मुझसे मेरे ज़ज्बात सुनने को
नहीं है मानता जिद्दी है कितना सख्त कितना है
बड़ी मुश्किल है, गर बयां करे भी तो करें कैसे
ना तो लब्ज़ इतने हैं ना तो वक़्त इतना है
……………………………. Shubhashish

यूँ हीं…. (2)

17 फरवरी

यूँ हीं….

2 मई

यूँ हीं.....

खुशनसीब …… या बदनसीब….

8 दिसम्बर

वो अक्सर मेरे पास मुस्कुराते हुए आता
और बड़े गुमान से बताता
यार !
मुझे तो कभी हुआ ही नहीं
‘ये प्यार’ ….
एक दिन मुझसे भी जवाब निकल ही गया
जाने तुझे क्या कहना चाहिए

खुशनसीब ……
की तुझे कभी
गुजरना नहीं पड़ा
दर्द के उस सैलाब से
जो कई बार दे जाता है उम्र भर की उदासी

या

बदनसीब….
की तुझे कभी
एहसास ही नहीं हुआ
दुनिया की उस सबसे खुबसूरत चीज़ का
जिसके लिए लोग
जानते हुए भी
हर दर्द को उठाने के लिए तैयार हो जाते हैं ………
सिर्फ उस एहसास के लिए …
वही एहसास …
जो इन्सान को…. इन्सान बनाता है
……………. Shubhashish

ख्वाहिश

14 अक्टूबर

बेसबब जूझना थकना और फिर से खुद से लड़ जाना
टूट जाने की हद तक चुप-चाप हर गम को सह जाना
तब होती है उसकी बाँहों में बिखर जाने की वो ज़िन्दगी सी तलब
पर आखिरी ख्वाहिश की तरह उस ख्वाहिश का भी आखिर तक रह जाना
…………………………… Shubhashish

सुकून

5 अक्टूबर

तमामो-उलझन और भाग दौड़ से आजिज
जब सुकून खोजता हुआ ये दिल
…जो जानता है की उसके पास
इससे बेहतर कोई तरकीब
तो हो ही नहीं सकती

तो सुकून पाने को ……
ठहर के देर तलक देखता हूँ …….तुझे…….. सिर्फ तुझे
……….. Shubhashish

क्या बताऊँ तुझे उदासी का सबब ऐ दोस्त की एक पूरी उम्र गुजारी जिसके साथ हर लम्हा,
और आज मर गया ……….. वही ख्वाब
………….Shubhashish