ख्वाहिश

14 अक्टूबर

बेसबब जूझना थकना और फिर से खुद से लड़ जाना
टूट जाने की हद तक चुप-चाप हर गम को सह जाना
तब होती है उसकी बाँहों में बिखर जाने की वो ज़िन्दगी सी तलब
पर आखिरी ख्वाहिश की तरह उस ख्वाहिश का भी आखिर तक रह जाना
…………………………… Shubhashish

सुकून

5 अक्टूबर

तमामो-उलझन और भाग दौड़ से आजिज
जब सुकून खोजता हुआ ये दिल
…जो जानता है की उसके पास
इससे बेहतर कोई तरकीब
तो हो ही नहीं सकती

तो सुकून पाने को ……
ठहर के देर तलक देखता हूँ …….तुझे…….. सिर्फ तुझे
……….. Shubhashish

क्या बताऊँ तुझे उदासी का सबब ऐ दोस्त की एक पूरी उम्र गुजारी जिसके साथ हर लम्हा,
और आज मर गया ……….. वही ख्वाब
………….Shubhashish

नेता बनाम आम आदमी

16 सितम्बर

नेता!
एक ऐसा शब्द जिसके सामने आते ही बस हर कोई अपनी भड़ास निकलने की जी तोड़ कोशिश करता है! बिक गए हैं नेता! भ्रष्ट हो गए हैं नेता! गरीबी, भूख-मरी, बाढ़… जिम्मेदार यही नेता हो हैं! अरे साहब इन्हें तो लाइन से खड़ा कर के गोली मार देनी चाहिए! इस देश की जो हालत हुई है उसके लिए यही प्रजाति तो जिम्मेदार है…………… पर सवाल ये है की इस प्रजाति में ऐसा अलग क्या है जो बाकि हिन्दुस्तानियों में नहीं है ………. या यूँ कहें की आम आदमी में नहीं है ?

हाँ ये सवाल थोडा टेढ़ा हो गया….. अच्छा ठीक है सवाल ऐसे करते हैं …… आम आदमी किस तबके से आता है ??? ऊपर से चलें या नीचे से ??? अच्छा बीच से कहीं से उठाते हैं …… बाबु … ये शब्द तो बहुत ऊँचे लोगो के लिए तो नहीं है न ………. कितने प्रतिशत बाबु आप का काम बिना रिश्वत लिए कर देते हैं ??? या कितने प्रतिशत जूनियर इंजीनियर (J.E.) भ्रष्ट नहीं है ??? शिक्षक ……… समाज का सबसे प्रबुद्ध वर्ग….. कितने प्रतिशत शिक्षक अपना कार्य कर्त्तव्य परायणता के साथ करते हैं ………. क्या ये भारत की आम जनता नहीं है ???
और आगे चलते हैं ……..
सरकार तो कुछ काम ही नहीं करती …… अब भाई सरकार क्या करे ?? योजना ही तो चला सकती है पर वो आम आदमी के नाम पर कमाने का साधन मात्र है… यही ना ?? अब सरकार ने गरीब बच्चों के लिए एक पहल की – ‘मिड-डे मिल’ ! शायद आप में से कुछ लोगो ने नाम भी सुना होगा …. होता क्या है या तो जो बनता है वो खाने लायक नहीं रहता या फिर ऊपर वाले (ये बहुत ऊपर वाले नहीं है आम आदमी में से हैं ) लोग खा के ख़तम कर देतें है . अब सरकार क्या करे … वो तो आम आदमी का कुछ भला करना चाहती भी है तो आम आदमी आदमी एक दुसरे का हक मरने पे तुला हुआ है और दोष तो सरकार को ही मिलना है…..

मेरे यहाँ यहीं बगल में नॉएडा स्टेडियम है पर उसमे जो कुछ भी लगाया जाता है लोग घुस के चुरा के ले जाते हैं और बेच देते हैं ……… अब स्पोर्ट्स में सुविधा कहाँ से आये …… या तो मैंदान बना के उसमे किसी को खेलने न दिया जाये तो सारी सुविधा रहेंगी या फिर आम आदमी सुधर जाये तो ………
शायद अभी भी मैं कुछ लोगों के ‘आम आदमी’ की व्याख्या नहीं कर पा रहा हूँ तो वो ऐसे कर देता हूँ : कोई भी १०० गरीब ग्राम चुना जाये उसमे से यद्रिछ्या (at random) १०० लोगो(हर गावं से कोई भी एक आदमी) को चुना जाये और हर इन सभी को १-१ लाख रुपये दे दिए जायें की आप अपने गाँव के गरीबों में बाट दीजियेगा………. जितने प्रतिशत रुपया सही और जरुरत मंद लोग (वो देने वाले का रिश्तेदार ना हो, गरीब हो) को मिल पाए बस उतने प्रतिशत भारतीय भ्रष्ट नहीं हैं! और बाकि आप समझ ही गए होंगे की इसकी क्या सम्भावना है ……………..
सच्चाई ये भी है की यहाँ इमानदार को बेवकूफ भी समझा जाता है … मैं किसी और का क्या उदाहरण दूं मैं अपना हे देता हूँ ! मैं ट्रेन में सफ़र कर रहा था और मेरे टिकट न मिल पाने की वजह से मैं सामान्य श्रेणी का टिकट लेके और शयनयान में बैठ गया टीटी आया तो मैंने उसे टिकट बनाने को कहा ये जानते हुए भी की इतनी भरी ट्रेन में सीट नहीं मिल पायेगी और २५० रूपये अतिरिक्त भी देने होंगे पर चुकी नियम यही है इसलिए टीटी को १०० रूपये पकड़ाने की जगह मैंने ये रास्ता चुना ….. आम आदमी मेरे अगल बगल मुझे ये समझा रहे थे की आप को सीट भी नहीं मिलेगी …… यानि की रिश्वत देके काम चलाओ …….. और ऐसा नहीं करने के कारन मैं उनकी नज़रों में एक ईमानदार नहीं मुर्ख व्यक्ति ही था और हूँ ……….
साहब यही हालत और हालात हैं नेता के पास भ्रष्ट होने के ज्यादा तरीके हैं इसलिए वो ज्यादा भ्रष्ट हैं ! जिस भी आम आदमी के पास वो तरीका आएगा वो ही भ्रष्ट हो जायेगा अपवाद तो अब भी हैं तब भी रहेंगे! जिसे मैका नहीं मिलेगा वो गली देगा!
मानो या न मानो आम आदमी ज्यादा भ्रष्ट है! ये नेता भी इन्ही में से एक है जो अब खास हो गया है! जिस दिन मेरे देश का आम आदमी सुधर जायेगा उस दिन इस देश में भ्रस्टाचार फ़ैलाने वाले नहीं रह पाएंगे!

नोट: यहाँ मेरा मकसद भारतीयों को भ्रष्ट कहना नहीं है बल्कि ये कहना है की अपनी सरकार को हर बात पे कोसने के पहले हमे सोचना चाहिए की हम क्या कर रहे हैं !
ये लोकतंत्र भी हमारा है इसे गाली देना देश का अपमान ही है बेहतर है की हम कुछ सार्थक करें!

बला का नाम है बीवी

11 सितम्बर

जीवन में ढलती खुशियों की शाम है बीवी
जो पढ़ी नहीं सिर्फ सुनी जाये वो कलाम है बीवी

सर चढ़ गयी तो फिर कुछ भी अपने बस में नहीं
ये जान के भी जो पी जाये वो जाम है बीवी

क्यों मारी पैर पे कुल्हाड़ी जेहन में उनके है अब
जो सोचते थे चक्कर काटने का इनाम है बीवी

अरेंज मर्डर हुआ हो या इश्क में खुद ही चढ़ गए सूली
जो सब को झेलनी, ऐसी उलझनों आम है बीवी

सजा तय है जो जुर्म किया हो न किया हो
रोयी नहीं की फिर क्या सबूत क्या इलज़ाम है बीवी

माँ की कहानियों में ही होती थी सावित्री, दमयंती
मगर अब शहरी चका-चौंध की गुलाम है बीवी

क्या करो, ओढो, पहनो ये बताने की जुर्रत किसको
पर क्या ये खर्चे मेरे पसीने का दाम है बीवी

माँ-बाप पीछे पड़े हैं कैसे समझाऊ उन्हें
बदलते दौर में किस बला का नाम है बीवी

कुंवारा हूँ सो कह लूं आज जो कुछ भी कहना है
कल तो लिखना ही है खुदा का पैगाम है बीवी
…………………………. Shubhashish

Note: ये सिर्फ हास्य के लिए लिखी गयी कविता है! कृपया इसे किसी अन्य दृष्टी से न देखें !
कहीं से भी इस कविता का उद्देश्य नारी का उपहास करना नही है! फिर भी यदि किसी की भावनाओं को ठेस पहुची हो तो उसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ !
– शुभाशीष

ऐसा था मेरा बचपन

15 अगस्त

गोलियों वाली स्लेट और चुने की खड़िया
मचल जाता था देख मन चूरन की पुडिया
कभी खेलते थे लूडो कभी छुपा छुपायी
कभी प्लास्टिक किचेन सेट, कभी गुड्डे गुडिया

बांस के ऊपर लपेट लाता, लटपटी मिठाई वाला
जादू लगता जब वो बनाये उससे घडी, बिच्छू, माला
खुद खायी भी और दीदी को खिलाते आईसक्रीम
फिर बताते तुम्हारा ही पैसा था गद्दे के नीचे वाला

बिजली कटने पे भी हम जश्न मनाया करते थे
छत पे जुट अन्ताक्षरी के गाने गाया करते थे
किसी का घर बनने को जब गिरता था बालू
रेत के घर बना उसे खूब सजाया करते थे

क्लास टीचर मेरी ही कांपी झाकती थी
जाने क्यों हर रोज वो मुझी को डांटती थी
स्कूल जाना तो कभी मुझको मंजूर नहीं था
पर पापा के आगे मेरी रूह कापतीं थी

स्कूल न जाने के १०० बहाने फ्लॉप हो जाते थे
जब मेरे सामने गुस्से में खड़े मेरे बाप हो जाते थे

पर स्कूल वालों से हमें कभी डरना नहीं आया
क्या क्या न हुआ पर होम-वर्क कभी करना नहीं आया
उनके लिए हम कितने जतन कर कर के मर गए
पर किसी को हमारी लिखावट कभी पढना नहीं आया

आँखे रंगोली से खुलती फिर चाय की प्याली
अक्सर आती थी सन्डे को जिलेबी गर्म वाली
राम-लक्ष्मण के दर्शन को लग जाता वहां मेला
टीवी हो जिसके घर में छोटी या बड़ी वाली

अलिफ़ लैला सिन्ध्बाद और तिलस्मी जंजिरा
सन्डे होता था हमारी खुशियों का जखीरा
विक्रम बेताल और वो दादा दादी की कहानियां
प्यारा बहुत था हमे मोगली और बगीरा

एक रुपया मुठ्ठी में आया नहीं की
सारी दुनिया की खुशियाँ मुठ्ठी में हो जाती
क्या नहीं खरीद सकता हूँ मैं इससे बोलो
आज सोच के ही कितनी हसी है आती

ऐसा नहीं की पढने में न हो इंटरेस्ट मेरा
कई किताबों का घर में लगा रहता था डेरा
पिंकी, बिल्लू, चंपक भी घर आते जाते
चंदामामा और नंदन का यहीं था बसेरा

पर नागराज था हमको जान से प्यारा
सुपर कमांडो ध्रुव भी था अच्छा दोस्त हमारा
बांकेलाल की चाल हमेशा पड़ती थी उल्टी
डोगा से कांपता था रात को अंडरवर्ल्ड सारा

दाल में काला सबको नज़र आने लगा था
वक़्त किताबों में मैं कैसे बिताने लगा था
बुक में छुपा कामिक्स पढता जब पकड़ा गया मैं
दिन में तारे दिखे और अँधेरा छाने लगा था

बहुत तेज है चाचा चौधरी का दिमाग पढ़ा था
फट जाये ज्वालामुखी साबू का गुस्सा इतना बड़ा था
पर पापा के गुस्से की हकीक़त कुछ यूँ सामने आई
टुकड़े टुकड़े हो नागराज ज़मीन पे बिखरा पड़ा था

स्कुल में हालत मेरी कुछ हो गयी थी ऐसी
मार-मार कर बिगड़ी मशीन का पुर्जा बना देते थे
माँ भेजती थी की बेटा पढ़ लिख के इंसान बन जायेगा
और वो थे की हर रोज मुझे मुर्गा बना देते थे

जब पापा की जेब से आखरी बार १० की नोट उड़ाई
लगा ‘आज तो गए हम’, यूँ बात सबके सामने आई
पापा की ख़ामोशी और माँ के आंसू ने दर्द इतना दिया कि
रोया बहुत माँ से लग के, और कसमें भी खायी

आवारा कुत्ते के बच्चों को घर में ला के मैं छुपाता
रोटी दूध खिला-खिला कर खूब प्यार उसपे लुटाता
पर आधी रात को पापा तब मेरी खबर अच्छे से लेते
जब वो कुं-कुं-कुं-कुं चिल्ला कर, पूरी दुनिया को जगाता

जब से वो आई थी बस ख़याल उसी का रहता था
साथ ही आता जाता था, साथ ही उसके रहता था
जिसके आगे दुनियां की सारी चीज़ें बेकार थी
सच कहता हूँ वो मेरी साईकिल मेरा पहला प्यार थी

क्रिकेट में इंडिया की हालत जब बिगड़ने लगती
टीवी के बाजु भगवान की फोटो सजने लगती
सचिन के आउट होते ही खड़ा हो जाता था संकट
फिर अपनी गली क्रिकेट वापस चलने लगती

मैदान हो या छत, कोई जगह नहीं बच पाती
क्रिकेट तो क्लास में किताब से भी खेली जाती
पर जाने क्या प्यार था बाल को सड़क की नाली से
हर दुसरे शाट पे वो कमबख्त नाली में ही जाती

एक नयी डगर पे ज़िन्दगी जाने लगी थी
बात हमको भी समझ अब आने लगी थी
बचपन तब ख़तम होता लगने लगा जब
किसी से आँखे अक्सर टकराने लगी थी

जैसे भी हैं, वो हर लम्हे हैं मुझको बहुत प्यारे
माँ पिताजी को शत शत बार नमन
बस इतना ही था कहना ,यही कहानी है मेरी
ये था मैं और “ऐसा था मेरा बचपन”
……………….. Shubhashish

I love you Mom. I love you Dad.

सवाल….

14 जून

1)
सवाल….
जाने कितने सवाल …..
अचानक ही पुरानी यादों में बहते जाते,
और एक के बाद एक यादों में खोते जाते…
फिर आ खड़े होते वही सवाल….
उसने ऐसा क्यों किया …
अब वो कैसा होगा …
क्या वो खुश होगा …
क्या उसकी ज़िन्दगी में सब कुछ सही होगया होगा …
क्या उसे कभी मेरी याद आती होगी ……
क्या उसने कभी मेरा जिक्र किया होगा ……
जाने कितने सवाल …
जिनके जवाब शायद कोई मायने ही नहीं रखते
क्युकी भले ही जवाब कुछ भी हो ….
ये जवाब तो अब सिर्फ तकलीफ बढ़ा सकते हैं…
जनता हूँ मैं भी …..
पर फिर भी जाने क्यों ख़तम नहीं होते …..
ये सवाल……….
Shubhashish

2)
कोई शिकवा – शिकायत तो नहीं बस कुछ सवालों का पुलिंदा है
कुछ सवाल तुझसे करने हैं कुछ खुदा से
यूँ तो तुमसे फिर मिलने की उम्मीद नहीं
और ये सवाल भी अब बस जेहन में ही रह जाने हैं
पर अब ज़िन्दगी भी कुछ ज्यादा ही लम्बी लगती है
और खुदा से मिलना भी अब आसान नहीं लगता
खुदा को भी ये इल्म तो है ही
की दिन-ऐ-आखरत पे जवाब उसे भी देने होंगे
पर शायद वो भी अब तक तैयार नहीं मेरे सवालों का जवाब देने के लिए
वो भी कतराता है मुझसे नज़र मिलाने में
मौत दे के मुझे पास बुलाने में
………………..Shubhashish

बरसात

29 मई

घर से निकला ही था की बरसात हो गयी
आज मौसम से अचानक यू मुलाकात हो गयी

जाने कब दिखी वो और हम यूँ ही कब तक खड़े रहे
पता भी नहीं चला की यहाँ कब रात हो गयी

यूँ तो तेरे होठों से लगी वो बस बारिश की एक बूँद थी
फिर जाने क्यों मेरी आँखों के लिए वो कायनात हो गयी

मौत भी लौट जाये गर मेरे होठों पे हो वो बूँद
जो तेरे होंठों को छू के आब-ए-हयात हो गयी
………………………………………. Shubhashish