नेता बनाम आम आदमी

16 सितम्बर

नेता!
एक ऐसा शब्द जिसके सामने आते ही बस हर कोई अपनी भड़ास निकलने की जी तोड़ कोशिश करता है! बिक गए हैं नेता! भ्रष्ट हो गए हैं नेता! गरीबी, भूख-मरी, बाढ़… जिम्मेदार यही नेता हो हैं! अरे साहब इन्हें तो लाइन से खड़ा कर के गोली मार देनी चाहिए! इस देश की जो हालत हुई है उसके लिए यही प्रजाति तो जिम्मेदार है…………… पर सवाल ये है की इस प्रजाति में ऐसा अलग क्या है जो बाकि हिन्दुस्तानियों में नहीं है ………. या यूँ कहें की आम आदमी में नहीं है ?

हाँ ये सवाल थोडा टेढ़ा हो गया….. अच्छा ठीक है सवाल ऐसे करते हैं …… आम आदमी किस तबके से आता है ??? ऊपर से चलें या नीचे से ??? अच्छा बीच से कहीं से उठाते हैं …… बाबु … ये शब्द तो बहुत ऊँचे लोगो के लिए तो नहीं है न ………. कितने प्रतिशत बाबु आप का काम बिना रिश्वत लिए कर देते हैं ??? या कितने प्रतिशत जूनियर इंजीनियर (J.E.) भ्रष्ट नहीं है ??? शिक्षक ……… समाज का सबसे प्रबुद्ध वर्ग….. कितने प्रतिशत शिक्षक अपना कार्य कर्त्तव्य परायणता के साथ करते हैं ………. क्या ये भारत की आम जनता नहीं है ???
और आगे चलते हैं ……..
सरकार तो कुछ काम ही नहीं करती …… अब भाई सरकार क्या करे ?? योजना ही तो चला सकती है पर वो आम आदमी के नाम पर कमाने का साधन मात्र है… यही ना ?? अब सरकार ने गरीब बच्चों के लिए एक पहल की – ‘मिड-डे मिल’ ! शायद आप में से कुछ लोगो ने नाम भी सुना होगा …. होता क्या है या तो जो बनता है वो खाने लायक नहीं रहता या फिर ऊपर वाले (ये बहुत ऊपर वाले नहीं है आम आदमी में से हैं ) लोग खा के ख़तम कर देतें है . अब सरकार क्या करे … वो तो आम आदमी का कुछ भला करना चाहती भी है तो आम आदमी आदमी एक दुसरे का हक मरने पे तुला हुआ है और दोष तो सरकार को ही मिलना है…..

मेरे यहाँ यहीं बगल में नॉएडा स्टेडियम है पर उसमे जो कुछ भी लगाया जाता है लोग घुस के चुरा के ले जाते हैं और बेच देते हैं ……… अब स्पोर्ट्स में सुविधा कहाँ से आये …… या तो मैंदान बना के उसमे किसी को खेलने न दिया जाये तो सारी सुविधा रहेंगी या फिर आम आदमी सुधर जाये तो ………
शायद अभी भी मैं कुछ लोगों के ‘आम आदमी’ की व्याख्या नहीं कर पा रहा हूँ तो वो ऐसे कर देता हूँ : कोई भी १०० गरीब ग्राम चुना जाये उसमे से यद्रिछ्या (at random) १०० लोगो(हर गावं से कोई भी एक आदमी) को चुना जाये और हर इन सभी को १-१ लाख रुपये दे दिए जायें की आप अपने गाँव के गरीबों में बाट दीजियेगा………. जितने प्रतिशत रुपया सही और जरुरत मंद लोग (वो देने वाले का रिश्तेदार ना हो, गरीब हो) को मिल पाए बस उतने प्रतिशत भारतीय भ्रष्ट नहीं हैं! और बाकि आप समझ ही गए होंगे की इसकी क्या सम्भावना है ……………..
सच्चाई ये भी है की यहाँ इमानदार को बेवकूफ भी समझा जाता है … मैं किसी और का क्या उदाहरण दूं मैं अपना हे देता हूँ ! मैं ट्रेन में सफ़र कर रहा था और मेरे टिकट न मिल पाने की वजह से मैं सामान्य श्रेणी का टिकट लेके और शयनयान में बैठ गया टीटी आया तो मैंने उसे टिकट बनाने को कहा ये जानते हुए भी की इतनी भरी ट्रेन में सीट नहीं मिल पायेगी और २५० रूपये अतिरिक्त भी देने होंगे पर चुकी नियम यही है इसलिए टीटी को १०० रूपये पकड़ाने की जगह मैंने ये रास्ता चुना ….. आम आदमी मेरे अगल बगल मुझे ये समझा रहे थे की आप को सीट भी नहीं मिलेगी …… यानि की रिश्वत देके काम चलाओ …….. और ऐसा नहीं करने के कारन मैं उनकी नज़रों में एक ईमानदार नहीं मुर्ख व्यक्ति ही था और हूँ ……….
साहब यही हालत और हालात हैं नेता के पास भ्रष्ट होने के ज्यादा तरीके हैं इसलिए वो ज्यादा भ्रष्ट हैं ! जिस भी आम आदमी के पास वो तरीका आएगा वो ही भ्रष्ट हो जायेगा अपवाद तो अब भी हैं तब भी रहेंगे! जिसे मैका नहीं मिलेगा वो गली देगा!
मानो या न मानो आम आदमी ज्यादा भ्रष्ट है! ये नेता भी इन्ही में से एक है जो अब खास हो गया है! जिस दिन मेरे देश का आम आदमी सुधर जायेगा उस दिन इस देश में भ्रस्टाचार फ़ैलाने वाले नहीं रह पाएंगे!

नोट: यहाँ मेरा मकसद भारतीयों को भ्रष्ट कहना नहीं है बल्कि ये कहना है की अपनी सरकार को हर बात पे कोसने के पहले हमे सोचना चाहिए की हम क्या कर रहे हैं !
ये लोकतंत्र भी हमारा है इसे गाली देना देश का अपमान ही है बेहतर है की हम कुछ सार्थक करें!

11 Responses to “नेता बनाम आम आदमी”

  1. Raj Kumar सितम्बर 16, 2010 at 5:58 अपराह्न #

    “ये लोकतंत्र भी हमारा है”

    “हम” kaun hain…..? 90% poors or 10% elites….

    Last week a policeman ask me for bribe and I think “He is shameless, while asking for bribe, but myself and many like me, get bribe, with the feeling of success in the competition, and feel that those who are asking are wrong, while we all, who are indirectly given bribe, are honest and loyal patriots of the country.”

  2. Arpit Shrivastava सितम्बर 16, 2010 at 5:58 अपराह्न #

    Bahut Badhiya Likha hai.
    Katu parantu satya

  3. DEEP सितम्बर 16, 2010 at 6:05 अपराह्न #

    wah sir ji kya likha hai …. aadhunik samj ki nangi tasweer ..

  4. kumar vishal सितम्बर 16, 2010 at 6:41 अपराह्न #

    shubhu bhaiya yahn mera ek prashna hai , jais aki aap ne upar likha hai ki aap ne rail me 250 Rs penalty di and bla bla .. well mera prashna ye hai ki aaj aap itane smarth the ki aap ke liye 250Rs was not bid deal , but kya aaaj se 5-6 saal pahle jab hum student hua karte the to kya aisi dasha me aap ne riswat nahi di hai ????at least maine to kiy hai ye do no hi kam aaj mai jab smarth hoon to mujhe lagta (to maini traffic polica se poora rashid katvaya hai ) yahi aaj se 4 sal pahale riswat di hai traffic police ko , to iske bare kya kehan hai , mai vahi hoon behaviour change hai …????????

  5. virtualkumar सितम्बर 17, 2010 at 9:12 पूर्वाह्न #

    Priya Mitra,

    Mujhe Supreme Court ki ek Comment yaad aa rahi hai jo Hon’ble Bench ne Summer Vacation pe jaane se pahle di thi UP ke statue issue par for MayaVati…

    Hum Kuch nahi kar sakte Vo Jo Kar rahi ahi unhe karne dijiye vo Pradesh ke Janta ke dwara Chuni hui Sarkar ki CM hain, Aur vo Janta ka paisa hai, jo vo kharch kar rahi hain…
    in democracy, Society gets the Govt, what it deserve…

  6. रवि कुमार, रावतभाटा सितम्बर 18, 2010 at 1:53 अपराह्न #

    बात कहीं आगे जाती है…

  7. Mayank सितम्बर 21, 2010 at 4:37 अपराह्न #

    सही और अच्छा लिखा है.
    इसके अलावा एक आम आदमी होने के नाते कोशिश करूँगा के भ्रष्ट न होऊं. हांलाकी मैं राज से भी कुछ हद तक सहमत हूँ के हम सभी किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार में शामिल हैं.
    मगर कोशिश तो कर ही सकते हैं अपने को और बाकियों को भी इस भ्रष्ट लोगों की पंक्ति से अलग खड़ा करने की.

  8. Shubhashish Pandey सितम्बर 22, 2010 at 11:54 अपराह्न #

    @raj kumar bhai apna vichar humse batne ke liye shukriya

    arpit ji, deependra ji bahut bahut shukriya

    @mayank bhai aap baat ki gambhirta ko na kewal samjhe balki use acharan me utarne ki baat bhi kar rahe hain main sach kahoon to mujhe apna ye lekh safal hota hua lag raha hai

    Ravi ji aap poori baat kahte to aur bhi harsh hota

    varun bhai sahmat hoon aapki baat se

    @vishal ji der se jawab ki liye khsma chahoonga.
    aapne meri us kahani ka maksad nahi samjha shayad. vo ye batane ke liye nahi thi ki maine pasie de ke bahut achha kaam kiya balki main ye kahna chah raha tha ki log us imandari ko bewkoofi maan rahe the

    aap ka ye prashn ki maine rishwat di hai ya nahi pe kahoonga haan diya tha par ek baar ek TT se thodi bahas hogayi tabse soch liya inko ek paisa bhi jeb me nahi doonga bhale mere uske 10 gune jyada jayein.tab se aaj tak TT ki or rishwat wala paisa nahi badhaya.
    main kabhi in haalaton me nahi tha ki ticket bhi na kharid paoon par haan paisa har koi bachana chahata hai, paise bachane ki ye ichchha tab tak gaalt nahi hai jab tak iske liye aap ko galat rasta na lena pade.

  9. Anurag Thakur फ़रवरी 23, 2011 at 4:55 अपराह्न #

    Bilkul sahi baat likhi hai subhashish tumne. Jo aaj neta hain wo bhi kabhi humari-tumhari jagah hi rahe honge. Desh usi taraf jayega jahan aam aadmi use lekar jayenge.
    To behtar hoga ki baithkar Netaon ko kosne ki bajay “aam aadmi” aage badhkar khud jimmewari lein aur jaisa desh ko dekhna chahte hain wo karke dikhayen.

  10. anand khanwalkar मार्च 12, 2012 at 10:10 पूर्वाह्न #

    bilkul saty kaha sir aapne hum har baat pe sarkar ko dosh dete hai saty to ye hai hum sab bharst hai ager wakai mai hame apne desh ko bharshtachar mukt banana hai to pahle hame swayam ko badlna hoga

  11. Shubhashish Pandey 'Aalsi' सितम्बर 4, 2013 at 2:17 अपराह्न #

    Anurag ji evam anand ji bahut bahut shuriya

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