Archive | अप्रैल, 2008

बड़ा अजीब सा है वो

30 अप्रैल

यूँ कहने को तो कई दिल-अजीज सा है वो, 
पर फिर भी सच में बड़ा अजीब सा है वो, 

दिन रात गैरों को वही सब बाटता रहता,
जिस चीज़ के लिए खुद बहुत गरीब सा है वो,

कितने दोस्त हैं उसके ज़माने भर में लेकिन,
खुद अपनी किस्मत के लिए एक रकीब सा है वो, 

तमाम सितारों के बीच में भी जो तन्हा ही रह जाता, 
कुछ वैसे ही चाँद जैसा नसीब सा है वो,

भाई भाई के खून का जहाँ प्यासा हो गया,
उस ज़माने में भी एक अदब तहजीब सा है वो,

जब नीद नहीं आती तो उसको सोचता हूँ मैं,
वक़्त गुजारने को, मेरे लिए, एक तरकीब सा है वो, 
………………………………….. Shubhashish

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रुक्सत

29 अप्रैल

(ये कविता मैंने २००५ में अपने seniours के लिए उनके farewell पे लिखी थी, जिसे आज यहाँ publish कर रहा हूँ )

Ruqsat ’05
रुक्सत…

By: Shubhashish Pandey

जैसे अभी कल ही तो मिले थे,
समां था कितना प्यारा,
लगा के सीने से अपने,
किसी ने किया था अभिषेक हमारा,

थे साथ नवेंदु कई मगर,
ना सर पे माँ का आँचल था,
पर रवि प्रतीक उन दीपक से,
मॅन का हर कोना उज्जवल था,

रुला के हसन हँसा के रुलाना,
टूट जाए तो फिर उनका धीरज बंधना,
अमित खुशियों से नाचे मयूर मेरे मॅन के,
याद कर के उनका हमें कैंटीन ले जाना,

कैसे भूलूंगा वो Exams की टेंशन
आदित्य मयंक के साथ पढना-पढाना,
पीयूष बोली सदा दिल में अंकित रहेगी,
गुज़र जाये भले कॉलेज का जमाना,

हरफनमौला अदाओं से जीता
जिन्होंने हर दिल को,
कैसे रुक्सत का पायेंगे ,
इन शाक्सियत के बैसिल को,

मस्ती के पलों में जब भी
कोई युगल सुर से सुर मिलाएंगे,
हमें तो हमेशा कॉलेज के
फणीन्द्र और मंजू ही याद आयेंगे

साथ बाटी हैं हमनें खुशियाँ अपनी सारी,
वक़्त राकेश या निशांत लवनीत का हो,
किसी का कहाँ कोई डर है रहता,
जब आशीष स्वयम अजय चक्रेश का हो,

तमन्ना हमारी बस इतनी है तुमसे,
ना तोड़ना कभी आपसी प्रेम के धागे,
आज लगता है मुश्किल तुम्हे छोड़ पाना,
पर मंजिल तुम्हारी है सूरज से आगे,

यादें…
(पल जो शायद आप कभी भूल नहीं पाएंगे)
By: Shubhashish Pandey

वोलीबाल की गेंदे, वो क्रिकेट का बल्ला,
कट जाए जो लाईट तो टोपी पे हल्ला,
रात की तनहाइयों में वो आपस की बातें,
साथ बैठ के बनाना वो धुवें का छल्ला,

12 बजे रात में बर्थडे की लातें,
फिर लगा के सीने से देना सौगातें,

खोखे पे बैठ के वो चौपाल लगाना,
Juniors को जबरदस्ती के Funde पिलाना,
फिर अचानक ही कही से थी आवाज आती,
“पलट दो!-पलट दो!
वर्ना पराठा जल जायेगा मामा…”

गर्ल्स हॉस्टल पर हर रात का ग्रुप-Discussion
दिवाली-होली पर करना वो चन्दा collection;
वो जाडो की रातों में श्री राम की चाय,
जुली किसकी है ?? – करना इसपे compromisation,

हर पल में अपनी कहानी छुपी है,
मस्ती के दिन हो या DEC 31 की रातें,
याद आएगा वो बिता हुआ हर वो लम्हा,
याद करेंगे जब भी हम अपने कॉलेज की बातें

………………………….Shubhashish(2005)

 इस कविता में प्रयुक्त शब्द में से ज्यादातर शब्द मेरे seniours के नाम हैं कुछ नामो के अर्थ यहाँ दिए हैं !

नवेंदु => नया चाँद ,अमित => अपार, आदित्य => सूरज, मयंक => चाँद, पियूष => अमृत, बैसिल => राजा, राकेश = चाँद, निशांत => रात का अंत करने वाला, लवनीत => सूरज की पहलो किरण

कल फिर

28 अप्रैल

कल फिर कुछ पहलू अनछुए से रह गये
कल फिर कुछ वादे अनकहे से रह गये
शायद मै जानता था कि ये आखिरी मुलाकात है
तभी कई अरमान दिल में दबे रह गये
…………………………………… Shubhashish(2005)

तुम रहे जब तक

24 अप्रैल

बस यूँ ही उनकी याद मे ज़िन्दगी गुजर जाये,
जिन्दगी की ये नाव कही तो जाके ठहर जाये,
उम्मीद थी इस जिंदगी से वफा की, तुम रहे जब तक,
पर अब डरता हूँ कही मौत भी बेवफाई ना कर जाये|
……………………………………… Shubhashish(2005)

फोर्थ इयर में आ के

23 अप्रैल

फोर्थ इयर में आ के जिदगी हो गई जंजाल है,
मेरे बिन गर्ल-फ्रेंड के यारों का, हो गया बुरा हाल है,
आपने साथ वालियों को देख देख के ऐसे बोर हुए
अब तो इनको हर faculty लगती केवल माल है.

कुछ की तो बिमारी अब हो गयी परमानेंट है,  
शादी-शुदा से ही इनका जुड़ जाता सेंटीमेंट है,
तुम्हे लड़कियां नहीं मिलती क्या ? पूछने पे जवाब देते हैं,   
“क्या करें यार अपना टेस्ट ही डीफेरेंट है” |
 …………………………. Shubhashish(2006)

अगर मेरे किसी पुराने दोस्त को बुरा लगा हो की उसके sentiments का मैंने मजाक उडाया है तो वो अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए स्वतंत्र है 🙂
अपनी भड़ास निकलने के लिए कम से कम एक बार फोन तो करे 😉  ………

तेरे लिये मिट जायें, तु ना जाने तो क्या

22 अप्रैल

दर्द उठायेंगे तुझे खुशीयाँ दिलाने के लिए,
जल जायेंगे तेरी राहों से अन्धेरा मिटाने के लिए,
तेरे लिये मिट जायें, तु ना जाने तो क्या,
काँटे तो होते ही हैं फूलों को बचाने के लिए|
……………………………….. Shubhashish(2004)

पा लिया है सब कुछ

22 अप्रैल

बस खुशीयाँ ही पायी हैं तेरे इश्क की छाँव में,
कई मंजिले पायी हमने इस इश्क की राहो में,
एक प्यार तेरा पाकर लगता है पा लिया है सब कुछ,
बस आखिरी ख्वाहीश है दम निकले तेरी बाँहो मे|
………………………….. Shubhashish(2004)